अगर आप भी इस मंच पर कवितायेँ प्रस्तुत करना चाहते हैं तो इस पते पर संपर्क करें... edit.kavitabazi@gmail.com

Thursday, October 10, 2013

मनी' इतने सरल इतनी सज्जनता शायद हि अब मिल पाए

....................प्रिय सचिन तेंदुलकर को समर्पित
देखते ही देखते ये सफ़र पूरा हो गया
खेल खेल ही रहा Sachin Tendulkar भगवान् हो गया

वाह ऐसा खेल खेला हम सब ना भूल पाएंगे 
तुम से ही होगा शुरू तुम पे ख़त्म पायेंगे

स्टीवा हो या ओलंगा या हो अख्तर
अब सब के सब चैन से सो पायेंगे

खेल तुमने जो भी खेला मुझको सब अच्छा लगा
फैन है जितने तुम्हारे शायद किसी के बन न पायंगे

मनी' इतने सरल इतनी सज्जनता शायद हि अब मिल पाए

गायत्री रेड्डी द्वारा बनाया गया
Photo: ....................प्रिय सचिन तेंदुलकर को समर्पित 

देखते ही देखते ये सफ़र पूरा हो गया 
खेल खेल ही रहा Sachin Tendulkar भगवान् हो गया 

वाह ऐसा खेल खेला हम सब ना भूल पाएंगे 
तुम से ही होगा शुरू तुम पे ख़त्म पायेंगे 

स्टीवा हो या ओलंगा या हो अख्तर 
अब सब के सब चैन से सो पायेंगे 

खेल तुमने जो भी खेला मुझको सब अच्छा लगा 
फैन है जितने तुम्हारे शायद किसी के बन न पायंगे

मनी' इतने सरल इतनी सज्जनता शायद हि अब मिल पाए

गायत्री रेड्डी द्वारा बनाया गया  स्केच

Tuesday, September 17, 2013

अगड़म- बगड़म AGDAM- BAGDAM : कुछ तो छोड़ो नेता जी..

अगड़म- बगड़म AGDAM- BAGDAM : कुछ तो छोड़ो नेता जी..: कुछ तो छोड़ो  नेता जी  मुंह तो मोड़ो नेता जी  दाल गटक गए, भात गटक गए  लोगों की औकाद गटक गए  कोयला, चारा, तेल गटक गए  स्टाम्प ...

Monday, September 16, 2013

......... कील :))

कारीगर ने
कील का सही उपयोग किया
लकड़ी के टुकड़ों को जोड़ कर
एक टेबल बना दिया //

कील ने भी
नहीं बिगड़ने दी उसका स्वरुप
दर्द सहकर भी //

दूसरी तरफ
एक नासमझ ने
कील को फेक दिया सड़कों पर
इस बार कील ने
स्वम दर्द नहीं सहा
बल्कि ...
कितनो को घायल कर गया //


21वी सदी का इन्द्रधनुष ब्लॉग से बबन पांडये जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ.....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 

Wednesday, August 28, 2013




कृष्ण तुम मेरे सारथी हो 

तुम रहते हो मेरी वार्डरोब में
काले रंग की उन साड़ियों में

जिन्हें खरीदा है मैंने
दिल्ली, मद्रास, हैदराबाद के बाज़ारों से
जब-तब लिपट जाते हो मेरे तन से
कृष्ण तुम मेरा आवरण हो

तुम बहते हो मेरे घर के नलकों में
जिनसे आता है यमुना का पानी
रोज़ कतरा कतरा पीती हूँ तुमको
कृष्ण तुम मेरा जीवन हो

तुम्हे बजते हो मेरे कानो में
जब जब सुनती हूँ एफ एम
कई गीतों ऐसे भी होते हैं
जिनमे एक सुर बासुरी का होता है
कृष्ण तुम मेरा मनोरंजन हो

कृष्ण तुम मेरी नोटबुक हो
तुम्हारे सिधान्तो के सहारे
मोटीवेशनल गुरु समझाते हैं अपनी बात
वो मानते हैं कि
तुम्हारी नीतियों के आगे शून्य है
कॉरपोरेट की पूरी दुनिया
तुमने कुरुक्षेत्र में जो कहा था
वो केवल अर्जुन के लिए नहीं था
इसीलिए तो आईआईएम और आइआइटी ने
किताबों में सहेज लिए हैं तुम्हारे मंत्र
कृष्ण तुम मेरा सेलेबस हो

कृष्ण तुम ट्राफिक की लाल हरी बत्ती हो
जीवन की आपाधापी में
जब विचारों का ट्राफिक जाम हो जाता है
जब मुश्किल हो जाती है अपनी राह पहचानना
तब याद आती है गीता
तब खुले हैं ज्ञान के द्वार
तब दिखता है रास्ता
कृष्ण तुम मेरे सारथी हो
================== अरशाना अज़मत 

Sunday, August 25, 2013



ये मेरी नाराजगी है भारतीय अर्थवय्वस्था व सैन्य वयवस्था को लेकर व तमाम देश के व समाज के ठेकेदारों के प्रति .

मनी'थक गया है झुक गया है कोई लूट रहा है
किसी ने सच कहा है हिंदुस्तान अब टूट रहा है

वतन पे मिटने वालो का जो वतन पे पहरा है
मनी'देख रहा हु साथ उनका भी अब छूट रहा है

गाली है तू कैसे कहू तुझको मै नेता वतन का
मनी'लूट कर मेरा वतन तू कहा अब फूट रहा है
=================मनीष शुक्ल

Wednesday, August 21, 2013

मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ

खुद से जीतने की जिद है, मुझे खुद को ही हराना है 
मै भीड़ नहीं हूँ दुनिया की, मेरे अन्दर एक ज़माना है 

मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 
डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
अजीब हाल है इस दुनियादारी का 
ये सारे हाल तेरे हाल पर ही छोड़ता हूँ 

डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 
डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 

टूटने दो टूटने के बाद ही तो कुछ बनेगा 
छूटने दो छूटने के बाद ही तो वो मिलेगा 
एक परिंदा है अभी जिंदा मुझमें कहीं थोडा बहुत 
उड़ने दो उड़ने के बाद ही तो वो कहेगा 

मै मलंग, बनके पतंग 
अपने फलक को चूमता हूँ 

डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 
डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 

अजीब हाल है इस दुनियादारी का 
ये सारे हाल तेरे हाल पर ही छोड़ता हूँ 


चाहता हूँ  मै भी उड़ना और तैरना 
चाहता हूँ  मै भी नाचूँ बनके झरना 
तोड़ दूं जंजीर जिनसे मै बंधा हूँ 
चाहता हूँ लिख दूं हवा पे नाम अपना 

चाहता हूँ इस कदर,
इसी चाह में मै झूमता हूँ 

डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 
डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 

अजीब हाल है इस दुनियादारी का 
ये सारे हाल तेरे हाल पर ही छोड़ता हूँ 

Friday, August 9, 2013

"शब्द सवेरे के, अब तक ताज़े हैं "

साँझ के 
झुटपुटे की पंक्तियों में, 
शब्द सवेरे के,

अब तक ताज़े हैं 
चलो, गुलदस्ता बना लेते हैं एक और,
जिंदगी के लिए; 

किसी 
झिडकन के साथ, 
बरसी है
बारिश ये अभी,
कुछ बूंदे हथेली पर, 
कुछ माथे पर हैं, 
अथक श्रम कर रही है जिंदगी ये 
जिंदगी के लिए; 

जो है 
लुटाने को उसे है  तत्पर,
ये मुट्ठी खुल रही है 
पालने  से पैरों  तक का 
सफ़र तय किया है,
अब कितनी अकलमंदी से 
गवां रहे हैं जिंदगी को, 
जिंदगी के लिए

थोड़ी इसे भी राहतें  बख्शें, 
थोड़ी सी धडकनें 
इसकी भी रह सकें साबुत,, 
सिफ़र  कर दें कभी तो चाहतों को 
शेष रख लें कभी तो थोडा समय 
बेनज़र  सी गुजर जाती हुई इस 
जिंदगी के  लिए;

एक चिड़िया 
सुबह जो चहकी थी, 
अभी भी शाख पर दिल की,
वक़्त की दालान में बैठी है 
एक हाथ का ही फासला ये 
चाहें तो फिर से एक बार 
थोड़ी सी गुनगुनाहट लें सहेज,
थोड़ी से चहचहाहट  
जिंदगी के लिए.   

Wednesday, July 31, 2013

रीढ़ की हड्डी नहीं गिरवी रखी, इसलिए ये सर तना है दोस्तों




गाँव से शहर आकर सादादिल लोगों को अक्सर शहर बड़ा लुभावना और शहरी तेजतर्रार लगते हैं... फिर याद आता है कि अब गाँव में भी गाँव कहाँ रहा है...गंवई राजनीति खून-खराबे, चौपालों के छल और भेदभाव सब भुलाकर... वो जीना चाहता है...शहर को जीतना चाहता है...आगे बढ़ना चाहता है....लेकिन कैसी जीत??? जो अपना ईमान दांव पर लगाकर मिले वो जीत भी भला जीत है???... श्री सी एम त्रिपाठी जी की इन चंद पंक्तियों में गाँव से आकर शहर में बसे किसी ऐसे ही आदमी की पूरी की पूरी ज़िन्दगी हैं.. पत्रकारिता के शुरूआती दिनों में मुझे कुछ माह उनसे सीखने का मौका मिला...खुशनसीबी है मेरी कि मैं उन्हें बापू जी कह पाती हूँ...

गाँव भीतर से घुना है दोस्तो

शहर लोहे का चना है दोस्तों 

उस महल के द्वार पर दस्तक न दो
वो सियासत से बना है दोस्तों

जो हमारा ही लहू पीता रहा
वो हमारा सरगना है दोस्तों

रीढ़ की हड्डी नहीं गिरवी रखी
इसलिए ये सर तना है दोस्तों

सी एम त्रिपाठी

Monday, July 29, 2013

अब वक्त की ठोकर पे खड़ा सोच रहा हूं



संक्षिप्त परिचय: मीडिया में करीब 18 साल से अपनी सेवाएं दे रहे श्री सी एम् त्रिपाठी मीडिया के ग्लैमर से कई मील दूर हैं... इनकी रचनायें तमाम मंचीय कवियों और रचनाकारों को ठेंगा दिखाती हैं... शब्दों और भाषा की मजबूत पकड़ रखने वाले श्री त्रिपाठी स्वतंत्र भारत में फीचर डेस्क प्रभारी के पद पर हैं... मीडिया में शराफत को सहेजकर चल रहे त्रिपाठी जी की खाली जेबें सिर्फ और सिर्फ सम्मान से भरी हैं... पैसे की कमी के कारन उनका अभी तक कोई रचना संग्रह नहीं आ सका है... कविताबाज़ी में हम लगातार उनकी कवितायेँ प्रकाशित करेंगे...ताकि आपतक ऐसे मसिजीवी भी पहुँच सकें जो धन की दीवार के पीछे छिप गए हैं....





सीने में ऐतबार के खंजर उतर गए
बरता जो ऐहतियात तो साये से डर गए

अब वक्त की ठोकर पे खड़ा सोच रहा हूं
दुःख दर्द मेरा बांटने वाले किधर गए

शायद कि मिल ही जाये सुकूं दोस्तों के बीच
पूछो न इस तलाश में किस किस के घर गए

गिरना ही था तो एक नहीं सौ मुकाम थे
ये क्या किया कि आप निगाहों से गिर गए

चंद्रमणि त्रिपाठी (सी एम त्रिपाठी)

Saturday, July 13, 2013



यारी है ईमान मेरा
यार मेरी जिन्दगी ...यारी है

LARGER PERSONALITY THAN LIFE

प्राण साहब अपने अभिनय के लिए हमेशा याद किए जायेंगे. बॉलीवुड को लगातार उनकी कमी खलेगी वो मात्र एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने अपने नकारात्मक किरदार सकारात्मक वेश भूषा में किया 320 फिल्मो में 200 से ज्यादा गेटप अपनाए. प्राण ने Unnao, Uttar Pradesh ,से प्राइमरी की शिक्षा ली और उत्तर प्रदेश के तमाम शहरो में रहे .प्राण एक एक्टिविस्ट भी थे आपातकालीन के दौरान उन्होंने इंदिरा सरकार का विरोध किया था. निजी जिन्दगी में प्राण बेहद उम्दा इंसान थे
उन्होंने अमिताभ बच्चन की कई बार मदद भी की थी

भावपूर्ण श्रधान्जली
कविताबाज़ी 

Wednesday, June 5, 2013


स्मरण / नूतन ( 4 जून, 1936 - 21 फरवरी, 1991 )
पारंपरिक भारतीय सौंदर्य और सरलता की प्रतिमूर्ति नूतन हिंदी सिनेमा के पांचवे और छठे दशक की एक बेहद प्रतिभाशाली और भावप्रवण अभिनेत्री रही हैं। परदे पर भारतीय स्त्री की गरिमा, ममता, सहृदयता, विवशता, तकलीफ और संघर्ष को जिस जीवंतता से उन्होंने जिया है, उसे देखना हमेशा एक दुर्लभ सिनेमाई अनुभव रहा है। नूतन ने चौदह साल की उम्र में अपने फिल्मी सफर की शुरूआत 1950 में अपनी मां और चौथे दशक की अभिनेत्री शोभना समर्थ द्वारा निर्देशित फिल्म 'हमारी बेटी' से की थी, लेकिन उन्हें सफलता और ख्याति मिली 1955 की फिल्म 'सीमा' से जिसमें बलराज सहनी उनके नायक थे। नूतन ने 70 से ज्यादा फिल्में की थी, जिनमें प्रमुख हैं - सीमा, हमलोग, आखिरी दाव, मंजिल, पेइंग गेस्ट, दिल्ली का ठग, बारिश, लैला मजनू, छबीली, कन्हैया, सोने की चिड़िया, अनाड़ी, छलिया, दिल ही तो है, खानदान, दिल ने फिर याद किया, रिश्ते नाते, दुल्हन एक रात की, सुजाता, बंदिनी, लाट साहब, यादगार, तेरे घर के सामने, सरस्वतीचंद्र, अनुराग, सौदागर, मिलन, देवी, मैं तुलसी तेरे आंगन की, साजन की सहेली, मेरी जंग, कर्मा आदि। उत्कृष्ट अभिनय के लिए उन्हें आधा दर्ज़न 'फिल्मफेयर' पुरस्कार मिले थे। जन्मदिन पर इस विलक्षण अभिनेत्री को श्रधांजलि, उनकी फिल्म ' सोने की चिड़िया ' के इस कालजयी गीत के साथ !

रात भर का है मेहमां अंधेरा
किसके रोके रुका है सवेरा

आ कोई मिलके तदबीर सोंचे
सुख के सपनों की ताबीर सोंचे
जो तेरा है वही ग़म है मेरा
किसके रोके रुका है सवेरा

रात जितनी भी संगीन होगी
सुबह उतनी ही रंगीन होगी
ग़म न कर गर है बादल घनेरा
किसके रोके रुका है सवेरा !


रात भर का है मेहमां अंधेरा किसके रोके रुका है सवेरा 
आ कोई मिलके तदबीर सोंचे सुख के सपनों की ताबीर सोंचे जो तेरा है वही ग़म है मेरा किसके रोके रुका है सवेरा 
रात जितनी भी संगीन होगी सुबह उतनी ही रंगीन होगी ग़म न कर गर है बादल घनेरा किसके रोके रुका है सवेरा !

Wednesday, May 8, 2013

संघर्ष का दूजा नाम ही तो जवानी है





मुखौटों ने अपनी शक्लें पहचानी हैं 

इसीलिए तो आईने से आनाकानी है 

परछाईं भी घटती बढती है पल पल 
खुद के दम पर नैया पार लगानी है 

अंधियारे की रात भयानक आई है 
जुगुनुओं की बरात हमें अब लानी है 

संविधान के खातिर खाकी खादी ने 
जो खायी थी कसमें याद दिलानी हैं 

टूटो-छूटो फिर से संवरो और डट जाओ 
संघर्ष का दूजा नाम ही तो जवानी है 


www.neerajkavi.blogspot.com



Tuesday, April 23, 2013

दिन में फैली ख़ामोशी -- संजय भास्कर


जब कोई इस दुनिया से
चला जाता है
वह दिन उस इलाके के लिए
बहुत अजीब हो जाता है
चारों दिशओं में जैसे
एक ख़ामोशी सी छा जाती है
दिन में फैली ख़ामोशी
वहां के लोगो को सुन्न कर देती है
क्योंकि कोई शक्श
इस दुनिया से
रुखसत हो चुका होता है ...........!!!!!

 
चित्र - गूगल से साभार

 
@ संजय भास्कर 
 
 
 

Monday, April 15, 2013

दुनिया पर हंसने का फ़न आसान नहीं, पहले अपनी हंसी उड़ानी होती है '

स्मरण / चार्ली चैपलिन ( 16.4.1889 - 20.12.1977 )
चार्ली चैपलिन मतलब विश्व सिनेमा का सबसे बड़ा विदूषक और सर्वाधिक चाहा गया स्वप्नदर्शी महानायक जो अपने जीवन-काल में ही किंवदंती बन गया। अपने व्येक्तिगत जीवन में बेहद उदास, खंडित, दुखी और हताश चार्ली ऐसे अदाकार थे जो भीषण और त्रासद परिस्थितियों को एक हंसते हुए बच्चे की निगाह से देख सकते थे। रूपहले परदे पर उनकी हर भाव-भंगिमा, हर हरकत अपने युग की सबसे लोकप्रिय मिथक बनी। विश्व सिनेमा पर इतना बड़ा प्रभाव उनके बाद के किसी सिनेमाई शख्सियत ने नहीं छोड़ा। हमारे राज कपूर ने श्री 420, अनाड़ी, जिस देश में गंगा बहती है, मेरा नाम जोकर जैसी कुछ फिल्मों में चार्ली को हिंदी सिनेमा के परदे पर पुनर्जीवित करने की कोशिश की थी। चार्ली बहुमुखी प्रतिभा के धनी फिल्मकार थे जिन्होंने अभिनय के अलावा अपनी ज्यादातर फिल्मों का लेखन, निर्माण, निर्देशन और संपादन ख़ुद किया। 1921 से 1967 तक लगभग पांच दशक के फिल्म कैरियर में उनकी सर्वाधिक चर्चित फ़िल्में थीं - The Kid, A Woman in Paris, The Gold Rush, The Circus, City Lights, Modern Times, The Great Dictator, Limelight, A King in New York, A Countess From Hong Kong आदि।

एक मासूम सी दुनिया का ख़्वाब देखने वाली नीली, उदास और निश्छल आंखों वाले ठिंगने चार्ली चैपलिन के जन्मदिन पर हमारी उदास और निश्छल श्रधांजलि एक शेर के साथ - '
दुनिया पर हंसने का फ़न आसान नहीं
पहले अपनी हंसी उड़ानी होती है '

गोपू का फेस्बुकिया इश्क



हमारे मोहल्ले के टशनी मित्र गोपेश्वर प्रसाद त्रिपाठी उर्फ़ गोपू। ये उनका उर्फ़ वाला नाम हम दोस्तों की देन है। वैसे गोपू भाई शुरवात में  मतलब जब हम लोगों की संगती में आये थे तब वो टशनी वशनी तो बिलकुल नहीं थे. एक सीधे सच्चे बच्चे थे। फिर बातों के साथ गलियों का ऐसा मिश्रण हुआ की मानो शरबत में नींबू नीचोड़ कर दे दिया हो किसी ने। वैसे बीप बीप वाली जुबान के मालिक गोपू आज कल दूसरी ही भाषा बोल रहे हैं। जैसे हँसते हैं तो कहते हैं लोल, कुछ बुरा लग जाए तो बोलते हैं  व्हाट द ऍफ़, और ज़्यादातर तो अपने टशनी फ़ोन के साथ ही लगे रहते हैं। हम दोस्तों से ज्यादा वो उन दोस्तों से बातें करते हैं। खैर अपन को कोई शिकायत नहीं, अपन तो फ़क्कड़ी आदमी हैं, दोस्त को अपन ने वहां भी पकड़ लिया। पर साला अब अबे की जगह हाय बोलना पड़ता है। खैर गोपू से फेस टू फेस न सही फेसबुक पर तो मुलाक़ात हो ही जाती है। 

हफ्ते में कभी कभार नहाने वाले गोपू फेसबुक में अपनी चमचमाती हुई प्रोफाइल फोटो और गूगल से उठाई गयी प्यार वाली कविताओं के लिए जाने जाते हैं। यह कार्य ये नियमित रूप से कर रहे है। वैसे एक काम और है जो ये बिना किसी देरी के करते हैं वो है लड़की की प्रोफाइल दिखी नही की इनका फ्रेंड रिक्वेस्ट का पहुंचना। वैसे उनकी कोशिस थोड़ी बहुत कामयाब भी हुई कुछ फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट भी हुई और बहुत सारी रिजेक्ट। खैर आशावादी गोपू ने रिजेक्शन को भूल एक्सेप्टेंस की ख़ुशी मनाई और अपने वाल पर चिपका दी किसी घटिया कवि की घटिया सी लाइन " बधाई हो दोस्तों हम हो गए आज हज़ार, बस इसी तरह से मिलता रहे आपका हर दिन प्यार" ।  प्यार से याद आया की अपनी 'गोप्स द डूड' के नाम से बनायीं गयी प्रोफाइल जुडी न जाने कितनी फेक आई डी वाली लड़कियों से और  न जाने कितनी बार प्यार कर बैठे थे हमारे मोहल्ले के टशनी मित्र गोपेश्वर प्रसाद त्रिपाठी उर्फ़ गोपू। हज़ारों बार दिल टूटा और लाखों बार खुद को संभाला, आखिर कार सोशल मीडिया पर होने का फायदा उन्हें मिलता हुआ दिखाई पड़ा। वो अब हर घंटे की अपडेट लिख देते हैं दिल का सिम्बल बना कर। इश्क वाला लव हुआ था या लव वाला इश्क पता ही नहीं चला।  ये अपना गोपू ही था जो की ऐसी ऐसी फोटो पर वहां नज़र आ रहा था या फिर कोई और। अभी तक फेस टू फेस न मिला गोपू फेसबुक पर इश्क के इज़हार को अपना संसार मान रहा था। 
इसका एक तो फर्क पड़ा, अब वो पुरा
ना वाला गोपू वापस मिल गया जो की हमसे पहली बार मिलने आया था। मतलब बिना गाली वाला सीधा बच्चा, इश्क जो न कराये वो कम। 

वैसे उस प्यार के चक्कर में उसने शहर के न जाने कितने और कहाँ कहाँ चक्कर लगाये, ऐसा लग रहा था कोई टीचर किसी बिगडैल बच्चे को जानबूझ कर ऐसा टास्क दे रहा है जिससे उसका ज्ञान भी बड़े और सजा भी मिले। पर यहाँ तो न कोई टीचर था और न ही कोई स्टूडेंट, यहाँ था तो ट्शनी की चाशनी से बहार आ चूका गोपू और उसका अनदेखा, अंजना (एकौर्डिंग टू हिम फेसबुक पर मिला और जाना पहचाना) प्यार। खैर अपनी ही दुनिया में मस्त गोपू मोबाइल और लैपटॉप से चिपका रहने वाला वो लड़का अब एक मीटिंग ही चाहता था, पर ये उसकी चाहत थी, हर चाहत हकीकत हो ये जरूरी तो नहीं। वैसे इतना सब होते हुए भी उसने किसी को कुछ नहीं बताया, पर एक दिन जब उससे नहीं रहा गया तो मुझसे बोलने लगा " यार नीरज ये बताओ की किसी को बिना देखे बिना मिले, या फिर केवल फेसबुक ( ये शब्द उसके मुह से अचानक निकल गया) पर मिले प्यार हो सकता है क्या?" मैंने कहाँ यार ये तो अपनी अपनी सोंच है वैसे के बार मिलकर ही फैसला लेना चाहिए दोस्त नहीं तो दिल टूटता है और उसकी आवाज़ तक नहीं आती है। 

शायद उसको ये बात कुछ जमी, और उसने उस पर मिलने के लिए खूब जोर डाला, और मीटिंग फिक्स हुई वो बड़ा बनठन के मिलने पहुंचा हाथों में गुलाब, आँखों में महंगा सा चश्मा अच्छी सी शर्ट पेंट और बेहद कीमती पर्फियुम से नहाकर। थोड़ी देर इंतज़ार के बाद उसको बताये हुए रंग (पिंक) की शर्ट और जीन्स में एक लड़की नुमा लड़का पहुंचा, उसे यकीन नहीं हुआ,  उस वक्त उसे लगा की  जो उसकी सोंच है वही सही है  ये जो नज़र आ रहा है ये भ्रम है इसी लिए उसने मुस्कुराकर वेलकम करते हुए जब अपन हाथ बढाया तो उसका अहसास भी उसकी सोंच की तरह ही कोमल था। मगर कहते हैं की जब सच का झोंका चलता है तो झूठ के सारे महल ढ़ह जाते हैं। वही हुआ जैसे ही उसने मुह खोला  गोपेश्वर प्रसाद त्रिपाठी उर्फ़ गोपू का सारा भ्रम फुर्र हो गया। फिर क्या था वो वहां से ऐसे भाग जैसे वहां आया ही न हो। 

वैसे सुना है की फेसबुक पर प्यार तो नहीं मिला पर फेसबुक से उसका प्यार अभी भी बरकरार है। लोग तो कहते हैं गोपू की खोज जारी है और उसकी लड़कियों को फ्रेंड रिक्वेस्ट सेंडिंग भी जारी है। 

Thursday, April 11, 2013

मनी' बहुत काम है कैसे मैनेज कर रहे हो तुम , मुश्किल रास्ता है पर कैसे कैसे चल रहे हो तुम



मनी' बहुत काम है कैसे मैनेज कर रहे हो तुम 
मुश्किल रास्ता है पर कैसे कैसे चल रहे हो तुम 


न कोई गुस्सा, न इरीटेसन, न फिजूल की बाते है  
ताजुब है और दिन पे दिन कैसे सुलझ रहे हो तुम 

इन दिनों न उसूल न कोई गजल न पॉलिटिक्स  
कुछ बताओ,सिर्फ सादे सादे कैसे रह रहे हो तु

कुछ तो है जो बदला हुआ इन दिनों, है न 
मानना पड़ेगा ये सब कैसे कर रहे हो तुम 
=======================मनीष शुक्ल 

मुझको न भूलाना तुम



तन्हाईयों से कहो चुप रहे, चीखना-चिल्लाना जरूरी था।
दिल को कौन दिलाए यकीन, उसका जाना जरूरी था।

अपने जागने का सबब यह कहकर छिपाया सबसे मैंने,
चांद सो न जाये, इसलिये मेरा जागना जरूरी था।

यह शर्त कहां थी मेरी, मुझको न भूलाना तुम,
हां, यह तय था, तेरा याद रहना जरूरी था।

तुमको बेवफा न कह दें मेरे जानने वाले कहीं,
इश्क में हादसा कोई, दोस्तों को सुनाना जरूरी था।

वक्त की जमीं पर बिखेर दिये खत के पुर्जे,
तू मेरा था कभी, यह सबसे छिपाना जरूरी था।


  • रविकुमार बाबुल


Sunday, April 7, 2013

पुण्यतिथि / बंकिम चंद्र चटर्जी

पुण्यतिथि / बंकिम चंद्र चटर्जी 
भारत के राष्ट्र गान के रचनाकार स्व. बंकिम चंद्र चटर्जी ( 27.6.1838 - 8.4.1894 ) बंगला के प्रथम और सर्वाधिक पठित उपन्यासकार रहे हैं। उन्नीसवी सदी में बंगला में उन्हें वही लोकप्रियता हासिल थी जो हिंदी में ' चंद्रकांता ' के लेखक देवकीनंदन खत्री को प्राप्त थी। राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत ' आनंद मठ ' उनका सबसे लोकप्रिय उपन्यास है। ' वंदे मातरम् ' इसी उपन्यास का अंश है। ' दुर्गेश नंदिनी ', ' कपाल कुंडला ', ' देवी चौधरानी ', ' विषवृक्ष ', ' इंदिरा ', ' रजनी ', ' राधारानी ', ' चंद्रशेखर ', ' मृणालिनी ', ' सीताराम ', ' कृष्णकांत का वसीयतनामा ' आदि उनके अन्य कालजयी उपन्यास हैं जिनके अनुवाद देश की सभी प्रमुख भाषाओं में उपलब्ध हैं। इस महान रचनाकार की पुण्यतिथि पर कृतज्ञ राष्ट्र की हार्दिक श्रधांजलि, उन्हीं की रचना और हमारे राष्ट्र गान के साथ !

वंदे मातरम्
सुजलां सुफलाम् मलयजशीतलाम
शस्यश्यामलां मातरम् !

शुभ्र ज्योत्सना पुलकित यामिनीं
फुल्लकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम
सुहासिनीं सुमधुरभाषिनीं
सुखदां वरदां मातरम्
वंदे मातरम् !

" लोग हर मोड़ पे.. रुक-रुक के.. संभलते क्यूँ हैं... इतना डरते हैं .. तो फिर घर से.. निकलते क्यूँ हैं ;


" लोग हर मोड़ पे.. रुक-रुक के.. संभलते क्यूँ हैं...
इतना डरते हैं .. तो फिर घर से.. निकलते क्यूँ हैं ;

मैं न जुगनू हूँ.. दिया हूँ.. न कोई तारा हूँ...
रौशनी वाले .. मेरे नाम से.. जलते क्यूं हैं ;

नींद से मेरा.. ताल्लुक़ ही नहीं.. बरसों से...
ख्वाब आ-आ के.. मेरी छत पे.. टहलते क्यूँ हैं ;

मोड़ होता है.. जवानी का.. संभलने के लिए...
और सब लोग.. यहीं आ के.. फिसलते क्यूँ हैं..."

--------------------------- ' राहत इन्दौरी '

Tuesday, April 2, 2013

"ढूँढते ढूँढते.. ख़ुद को.. मैं कहाँ जा निकला... एक पर्दा जो उठा ... दूसरा पर्दा निकला ;


"ढूँढते ढूँढते.. ख़ुद को.. मैं कहाँ जा निकला...
एक पर्दा जो उठा ... दूसरा पर्दा निकला ;

मंज़र-ए-ज़ीस्त सरासर.. तह-ओ-बाला निकला...
गौ़र से देखा.. तो हर शख़्स.. तमाशा निकला ;

एक ही रंग का ग़म.. खाना-ए-दुनिया निकला...
ग़मे-जानाँ भी ..ग़मे-ज़ीस्त का साया निकला ;

इस राहे-इश्क़ को हम.. अजनबी समझे थे मगर...
जो भी पत्थर मिला .. बरसों का शनासा निकला ;

आरज़ू .. हसरत-ओ-उम्मीद.. शिकायत..आँसू...
इक तेरा ज़िक्र था.. और बीच में क्या क्या निकला ;

घर से निकले थे.. कि आईना दिखायें सब को...
हैफ़ ! हर अक्स में .. अपना ही सरापा निकला ;

जी में था.. बैठ के .. कुछ अपनी कहेंगे ’सरवर’...
तू भी कमबख़्त ! ज़माने का सताया निकला ..."

--------------------------------- ' सरवर '

शनासा = परिचित ,जाना-पहचाना
हैफ़ = हाय 

Friday, March 29, 2013

दुनिया की नजर जो न समझी वो जज्बात समझ लेना मेरे

इस छिपी हुई ख़ामोशी से 
तुम हालात समझ लेना मेरे 

है तंग बहुत रश्म ए  दुनिया 
पर तुम ख़यालात समझ लेना मेरे 

कहने का हक तो नहीं दिया 
पर मन के सवालात समझ लेना मेरे 

दुनिया की नजर जो न समझी 
वो जज्बात समझ लेना मेरे

===============सोनम तिवारी 

Monday, March 18, 2013

अपने हर अक्स का उन्स-ए-फ़ना हो जाऊँगा उसको वफ़ा कहके, कैसे बेवफ़ा हो जाऊँगा

अपने हर अक्स का उन्स-ए-फ़ना हो जाऊँगा
उसको वफ़ा कहके, कैसे बेवफ़ा हो जाऊँगा

बाग़-बतियाँ, फूल-पतियाँ, दर्द-ज़र्द हो जायेंगे
सिर्फ कहने भर से, क्या तुमसे जुदा हो जाऊँगा

बरहना हैं बहन मेरी, माँ भी कहाँ इससे जुदा
तुम ही कहो कैसे न! दहशत-ज़दा हो जाऊँगा 

आंधियाँ नफरत-ज़दा, तक़रीर है शोला-बयाँ
बाँट कर मैं भाई को, मुल्क-ए-सदा हो जाऊंगा

हर एक घर 'मकान' है, दरो-दीवार है आदमी
वक़्त लफ़्ज़-ख़ोर है, मैं भी ख़ुदा हो जाऊँगा

बद-ख़याली, बद-कलामी, बद-निज़ामी जा-बजा
मत बनो ख़ुश-फ़हम कि शायर बड़ा हो जाऊँगा!

(उन्स= लगाव, फ़ना = नष्ट, ज़र्द=पीला, बरहना= नग्न, शोला-बयाँ = आग उगलने वाली, सदा=आवाज़, बद-निज़ामी= गलत प्रबंध, जा-बजा=हर कहीं)

 क़मर सादीपुरी 

Saturday, March 16, 2013

तुम्हारी आंखो में एक तिलिस्म है एक आइना है




Wednesday, March 13, 2013

ज़बाँ पर मेरी, ऐसी ही तासीर रहे, ग़ालिब संग कबीर का होना, दे मौला!

थोड़ा हँसना, थोडा रोना, दे मौला!
दिल से दिल को राहत दो ना, हे मौला!

सात समुंदर पार की बातें कौन करे
अपने आम में मंजर होना, दे मौला!

झूठ की बारिश रंग-बिरंगी होती है
ऐसी छतरी सच की होना, दे मौला!

साए घनेरे बरगद के, कागा बोले
फूल-क्यारी, तोता-मैना, दे मौला!

मय-जंगल ही खिलखिल बच्चे लुप्त हुए
गिल्ली-डंडा, और खिलौना, दे मौला!

गंगा की पीड़ा पर जमना यूँ रोवे
कण-कण चांदी, कण-कण सोना दे मौला!

ज़बाँ पर मेरी, ऐसी ही तासीर रहे
ग़ालिब संग कबीर का होना, दे मौला!

 कमर सादिपुरी 

Friday, March 8, 2013

हर राज़ ले रहा है वो, मुझे ये यकीं दिलाकर, न तिलिस्म जानता है, न कोई जादू-टोना है


नये ख्वाब हैं गर तेरे पहलू में तो कह दे
आज की रात मुझे डर डर के नहीं सोना है

बिना जाने गर ये बाज़ी लगाईं है,तो लौट जा
इश्क के खेल में मुझे ईमान नहीं खोना है

बहुत गहरे हैं ज़ख्म माजी के, तू सुन ले
मेरी इक हद है, और वफादार नहीं होना है

हर राज़ ले रहा है वो, मुझे ये यकीं दिलाकर
न तिलिस्म जानता है, न कोई जादू-टोना है

===================मानसी

(कल की रात......)

Thursday, March 7, 2013

एक मुश्त में दिल दे आया, टुकड़ा टुकड़ा प्यार ख़रीदा


ध्रुव गुप्ता जी की गजल उन्ही की किताब ''मौसम के बहाने से


कुछ दहशत हर बार ख़रीदा
जब हमने अख़बार ख़रीदा

जींस भाव बाज़ार आपके
हमने क्या सरकार ख़रीदा

कतरा कतरा लहू बेचकर
एक दुनिया बीमार ख़रीदा

सच पे सौ सौ परदे डाले
फिर सपने दो चार ख़रीदा

ख्वाब दुआ उम्मीद इबादत
जीने के औजार ख़रीदा

उसके भीतर भी जंगल था
कल जिसने घरबार ख़रीदा

एक मुश्त में दिल दे आया
टुकड़ा टुकड़ा प्यार ख़रीदा

हम बेमोल लुटा देते है
तुमने जो हर बार ख़रीदा

एक भोली मुस्कान की ख़ातिर
कितना कुछ बेकार ख़रीदा

प्यार से भी हम मर जाते है
आपने क्यों हथियार ख़रीदा


Monday, March 4, 2013

ग़ज़ल खुद ही समा से उठ बैठी सारे मिसरे, अशआर है तुमसे


कैसे कह दूं एतिबार है तुमसे

इनकार नहीं, इक़रार है तुमसे

ग़ज़ल खुद ही समा से उठ बैठी
सारे मिसरे, अशआर है तुमसे

फ़ासला तो इसे नहीं कहते
सिर्फ यही बार-बार है तुमसे

कितने बाग़ों की सैर की मैंने
आँख क्यों अश्कबार है तुमसे 

क़मर की चाँदनी तुम्ही से है
कि ख़्याल गुलज़ार है तुमसे 

(बार-बार = परेशान होना, क़मर = चाँद )

क़मर सादीपुरी

Friday, March 1, 2013

बस तुम हो और मैं हूँ


बहुत दिनों के बाद असीम ने लिखी कविता जो बेहद पसंद आई


बस तुम हो और मैं हूँ

किस्से हों बातें हों यादें हों

थोड़ी खुशबुएँ, थोड़ी खुशियाँ, थोड़े सपने, थोड़ी रोशनी हो

सब थोड़ा थोड़ा

थोड़ी कहानियाँ हों


छोटे छोटे चुटकुले हो जायें


थोड़ी सी 'देर सुबह' की धुप भी हो


सब कुछ शांत हो, एक दम ठहरा हुआ


फिर पत्तों से कुछ आवाजें आयें 


हमारे चलने की


तुम्हारी हंसी भी होनी चाहिए


हमारे आसपास सपने टंगे हों


एकदम ताज़े ताज़े


तुम हो जाओ और मैं हो जाऊं 


बस और क्या


चाय मंगा लेंगे दो कप.


----------------------असीम त्रिवेदी 

Thursday, February 21, 2013

मनी' दूर हू पर मेरी हर रोज माँ से बात होती है , ताजुब है मेरी आवाज से मै कैसा हु बताती है ''माँ

मनी'मेरे आने की आहट भर से 
झट दरवाजे पे आ जाती है ''माँ

बुरे लोगो के संग जब देखती मुझको
मनी'डाटती मारती और रूठ जाती है ''माँ

मनी'खूब खेलने पर पापा भूखे रहने की सजा देदे या खूब डाटे
पापा को मानती भूखी रहती पर खाना मेरे संग में खाती है ''माँ

इतनी प्यारी इतनी भोली मेरे सब दर्द ले जाती
गर कभी नींद न आए मनी' लोरी सुनाती है ''माँ

मनी' दूर हू पर मेरी हर रोज माँ से बात होती है
ताजुब है मेरी आवाज से मै कैसा हु बताती है ''माँ

***********************मनीष शुक्ल 

Saturday, February 16, 2013

अरे, तुम तो हंस के भूल जाओगे, हमने यूं खुद को क्यूँ डुबो डाला



रात आँखों से बरसी थी शबनम
सुबह बारिश ने सब भिगो डाला

तुम्हें पाने की इक जुस्तजू में
देखो, वजूद भी हमने खो डाला

एक उलझन नहीं सुलझी हमसे
दिल की माला में सब पिरो डाला

चलो, अब बात ही कर ली जाए
दिल में इतना ही जब संजो डाला

अरे, तुम तो हंस के भूल जाओगे
हमने यूं खुद को क्यूँ डुबो डाला

शुभांगिनी राजपूत
(अपनी सखी मानसी की प्रेरणा से लिखी रचना )


Friday, February 15, 2013

दुविधा


मेरे कमरे में अब
धूप नहीं आती
खिड़कियाँ खुली रहती हैं
हल्की सी रौशनी है
मन्द मन्द सी हवा
गुजरती है वहाँ से
तोड़ती है खामोशी
या शुरू करती है
कोई सिलसिला
किसी बात के शुरू होने
से खतम होने तक का ।
कुछ पक्षी विचरते हैं
आवाज़ करते हैं
तोड़ देते हैं अचानक
गहरी निद्रा को
या आभासी तन्द्रा को ।
कभी बिखरती है
कोई खुशबू फूलों की
अच्छी सी लगती है
मन को सूकून सा देती है
पर फिर भी
नहीं निकलता
सूनापन वो अकेलापन
एक अंधकार
जो समाया है कहीं
किसी कोने में ।
©दीप्ति शर्मा