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Thursday, June 9, 2011

................बूढी पथराई आँखें



बूढी पथराई आँखें
एक टक त़कती
सूनी राहों को
जहाँ फैला है
सूनापन
इनकी खाली
जिंदगी सा
ये सूनापन ये तन्हाई
अब गैर नहीं
रोज़ मिल जाया करती है
वृद्धाश्रय के
गलियारों में
जहाँ ये आँखें
ढूँढती रहती है
बीते समय के निशान
यहाँ खो गए
सब रिश्ते नाते
रुखी, सल पड़ी
चमड़ी से खोई
नमी जिस तरह
हो चुकी है अब
शिथिल भावनाएँ
जू हुई जाती है शिथिल
चेतना तन की
फिर भी अक्सर
जतन से
जाकर कई बार
खिड़की के पास
ये बूढी पथराई आँखें
घंटों एक टक
तका करती है
इन सूनी राहों को
की बी
इन राहों पर
आता हुआ कभी कोई
अपना भी दिखे
अक्सर यूँही
ये बूढी पथराई आँखे....
तकती रहती है
इन सूनी राहों को............!!


 आप सभी ब्लॉगर साथियों को मेरा सादर नमस्कार .......लगभग दस दिन के अवकाश के बाद मैं आप सभी के समक्ष पुन: उपस्थित हूँ । और अपनी दीदी की एक कविता पढवाता हूँ उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी ...!




कवि परिचय :-
रानी विशाल दीदी

9 comments:

  1. वह वह बहुत ही अच्छे शब्द है !मेरे ब्लॉग पर जुरूर आए !
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  2. बहुत सुंदर रचना है,
    साभार- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  3. संजय, आपके दीदी की ये कविता बुढापे के दर्द को बखूबी बयान करती है । बहुत सुंदर और दर्दभरी रचना ।

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  4. ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया.

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  5. भास्कर जी,
    यथायोग्य अभिवादन् ।
    रावि दीदी की कविता आपके बहाने पढऩे को मिली। बहुत ही बेहतरीन ।
    जी... सूनी राह, आंखों का शेष रहा यह सूनापन हर किसीके हिस्से में आना ही है। क्यूं न आज हम साथ होकर इस चेहरे पर पड़े सल में अपना भविष्य खोज लें, सोचता हूं आज का यह स्वार्थ, कल कष्ट कम देगा?
    भीड़ में ऐसा सूनापन दिखलाने के लिये शुक्रिया।
    रविकुमार बाबुल

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  6. आपकी दीदी की ये रचना पढ़कर तो आखें नम हो गयी मुझे गाँव मै अकेले रह रहे आपने नानाजी की याद आ गयी

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  7. आखें नम हो गयी ||
    बेहतरीन ||

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  8. आता हुआ कभी कोई
    अपना भी दिखे
    अक्सर यूँही
    ये बूढी पथराई आँखे....
    तकती रहती है
    इन सूनी राहों को............!!
    ........

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