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Monday, April 30, 2012

समझने की कोशिश करता हू जब हर बार लगती हों अनजान हों

क्या बात है बहुत परेशान हों 
बोलती तस्वीर सी सुनसान हों 

समझने की कोशिश करता हू जब 
हर बार लगती हों अनजान हों 

कुछ कहोगे ये सोचता हू जब भी 
झुक जाती हों बस ज़िन्दाजान हों 

मुझे लगता है तुम मेरे साथ हों 
और तुम किसी  की पहचान हों 

क्या कहू करता था या हू या कुछ भी नहीं 
'मनी'मेरे लिए अब तो बस एक मेहमान हों 
--------------------------------मनीष शुक्ल 






8 comments:

  1. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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  2. मनीष भाई
    कैसे लिख जाते हो यार ऐसा सब........बहुत खुबसूरत

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  3. bas sanjay bhai jo man me ata hai wahi likh jate hai,,,,,,,,,,

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  4. क्या बात है बहुत परेशान हों

    बोलती तस्वीर सी सुनसान हों

    bahut acha likhi hai ye lines...

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