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Thursday, January 27, 2011

यहाँ फंतासी कुछ भी नहीं दोस्त ,,,,,,,,,,,

आपसे बे पनाह चाहत है मुझे 
सिर्फ हस दो इतने से राहत है मुझे 

यहाँ फंतासी कुछ भी नहीं दोस्त 
बस आपकी ही आदत है मुझे 

आपके दिल में भी कही हु मै 
ये सोचके बड़ी हैरत है मुझे 

सारे सहर में चर्चा है मेरा अब 
ये आपकी ही सोहरत है मुझे 

आपको चाह के गुनाह नहीं किया मैंने 
"मनी"बता दो पाक  मोह्हब्ब्त है मुझे 
......................मनीष शुक्ल 

11 comments:

  1. बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...

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  2. संजय जी ,असीम जी का ,,,,,,,,,,,,,,,,आभार

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  3. मुहब्ब्त के लिए कुछ खास दिल मखसूसू होते हैं,
    यह वो नगमा है,जो हर साज पर गाया नही जाता।।
    सारगर्भित उदगार।

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  4. आभार,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, सरोवर जी

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  5. अत्यंत प्रभावी रचना

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  6. काफी हट के लिखा है इसबार मनीष भाई
    ....... अच्छा लगा

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  7. आलोक जी एक मात्र प्रयास ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,आभार

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