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Tuesday, April 19, 2011

गजल


मेरी हयात में शरीक रहा, जब तेरे नाम का रिश्ता।


मेरा ख्वाब भी बुनता रहा तब तेरे नाम का रिश्ता।




कुछ गिला था तुझसे, शिकवे तेरे भी सुने थे मैंने,


जब तलक रहा मेरे नाम से, तेरे नाम का रिश्ता।




बहुत कोशिशें की, इजहार में तमाम तीज-त्यौहार रीत गये,


कभी चाहा ही नहीं उसने मुझको, रहा नाम का रिश्ता।




उसके दरीचे से बस एक मैं खाली हाथ लौटा हूं,


शायद जिस शख्स के साथ था मेरा, बस नाम का रिश्ता।




मैं उसकी राह कैसे अपने मंजिल की तरफ मोड़ देता,


जिस शख्स का था मेरी मंजिल से बस नाम का रिश्ता।



रविकुमार बाबुल


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ravi9302650741@gmail.com

Thursday, April 14, 2011

.........परिंदों को भी उड़ा देते हैं लोग


खुल के दिल से मिलो तो सजा देते हैं लोग
सच्चे जज़्बात भी ठुकरा देते हैं लोग
क्या देखेंगे दो लोगों का मिलना
बैठे हुए दो परिंदों को भी उड़ा देते हैं लोग !

.........ये पंक्तियाँ मझे SMS में मिली, अच्छी लगी तो ब्लॉग पर आपसे साझा कर लीं ! 


-- संजय भास्कर

Monday, April 11, 2011

ख्वाहिश की है |


                       
      
रौशन  जहाँ  की ही ख्वाहिश की है 
मैंने अपने दिल की झूठे  बाज़ार  में
सच्चाई के  साथ आजमाइश की है |

मालूम है बस फरेब है यहाँ तो 
फिर क्यों मैंने सपन भर आँखों में 
अपने उसूलों की नुमाइश की है |

जब मेरी जिन्दगी मेरी नहीं तो क्यों?
ख्वाब ले जीने की गुंजाइश की है |

कुछ जज्बात हैं मेरे इस दिल के 
उनको समझ खुदा से मैंने बस 
कुछ खुशियों की फरमाइश की है |

मैनें तो बस कुछ लम्हों के लिए 
रोशन जहाँ की ख्वाहिश की है |

- दीप्ति शर्मा 

Saturday, April 9, 2011

तेरा दीवाना भोलापन मुझको बहुत सताता है 
मनी,चुपके चुपके ये मेरे ख्वाबो में भी आता है 

जब जब मै उलझा रहता हू या टूटा रहता हू 
तब तब ये आकर मुझको सब समझाता  है 

गर कुछ भूल गया मै या खुद से रूठ गया मै 
तब ये आकर याद दिलाता और मुझे मनाता है 

कभी तो हसकर बाते करता कभी  मुझे डराता है 
सच तेरा दीवाना भोलापन मुझको बहुत सताता है 

कब आओगी  बतलादो कोई तो खबर भिजवादो 
हा थोडा इसको समझा दो इससे मन घबराता है 

तेरा दीवाना भोलापन मुझको बहुत सताता है 
मनी,चुपके चुपके ये मेरे ख्वाबो में भी आता है

Monday, April 4, 2011

हाय हाय

हम हुए तू और मिट गए तो किसी को खबर तक नहीं
तूने बस लिया मेरा नाम और दुनिया करे हाय हाय

क्या होगा जो पहुंचेगी बू-ए-रूह तुम तक
सूंघी जो दम-ए-शराब  तो करते हो हाय हाय

क्या है ज़िन्दगी अब दरिया इक्क ठहरे हुए पानी का सा है
हुई बारिश तो बड़ी खूब हुई न हुई अगर तो क्या अल्लाह हाय  हाय

मुददत हुई देखा बनाया सजाया बा ख्वाबों में ही तुझे
हुआ रु-बा-रु तेरे,देखि हकीकत तो दिल रो उठा हाय हाय

पेट भर  खुराक  ,जिस्म भर पैराहन और होश भर शराब
फिर भी पूछो जो हाल तो कहते हो न पूछो हाय हाय

   
गौरव मकोल

Saturday, April 2, 2011

खता नहीं है |



हर इन्सान में जज्बा है 
सच बोलने का फिर भी 
वो झूठ से बचा नहीं है |

पहना है हर चेहरे ने 
एक नया चेहरा 
और जीता है जिन्दगी  
जब वो  बोझ समझ पर ,
जिन्दगी उसकी सजा नहीं है 
वो झूठ से बचा नहीं है |


खुद को पहचान वो 
चलता है उन रास्तो पर 
जहाँ खुद को जानने की
उसकी कोई रजा नहीं है 
वो झूठ से बचा नहीं है| 

कहता तो है हर बात 
बड़ी ही सच्चाई से पर 
नजरें कहती है उसकी 
कि उसके पास सच बोलने 
 की कोई वजह नहीं है 
इसलिए ही तो वो
 झूठ से बचा नहीं है |
इसमें उसकी खता नहीं है |
                                      
- दीप्ति शर्मा 

Friday, April 1, 2011

तेरे वास्ते

क्या करूँ तेरे वास्ते ?
खुदा से सब कुछ  मांग लूँ  तेरे वास्ते!!
खुशियों से भरे हो तेरे रास्ते,
महफ़िलें सजती रहें तेरे वास्ते!!

क्या करूँ तेरे वास्ते ?
खुदा से सब कुछ  मांग लूँ  तेरे वास्ते!!
मुस्कराहट तेरे चेहरे पे बस जाये ऐसे,
खुशबू से फूलों का साथ है जैसे!!

क्या करूँ तेरे वास्ते ?
खुदा से सब कुछ  मांग लूँ  तेरे वास्ते!!
कामयाबी से भरे हों तेरे रास्ते,
खुशियाँ बरसे तेरे वास्ते!!

क्या करूँ तेरे वास्ते ?
खुदा से सब कुछ  मांग लूँ  तेरे वास्ते!!
कोशिश कामयाबी में बदल जाये तेरे वास्ते
असफलता सफलता में बदल जाये तेरे वास्ते!!

क्या करूँ तेरे वास्ते ?
खुदा से सब कुछ  मांग लूँ  तेरे वास्ते!!
धरती की गहराइयाँ भी कम  हो तेरी खुशियों के आगे ,
आसमान की ऊँचाइयाँ भी कम हों तेरे सफलता के आगे!!

क्या करूँ तेरे वास्ते ?
खुदा से सब कुछ  मांग लूँ  तेरे वास्ते!!
दिन के उजाले में तू जगमगाए,
रात के अँधेरे में तू चमचमाए !!

क्या करूँ तेरे वास्ते ?
खुदा से सब कुछ  मांग लूँ  तेरे वास्ते!!
दुआ ये मेरी कुबूल हो जाये,
खुशियाँ तेरे दर पे बरस जाये!!
 

Wednesday, March 30, 2011

कैसे बयां करूँ ?




मैं अपनी भावनाओ को 
शब्दों में कैसे बयां करूँ ?
शायद कहीं ऐसा ना हो ,
की कोई मुझे सुने ही ना ,
और कोई समझे ही ना 
वो बात जो सब समझे 
ये मैं कैसे पता करूँ ?
मैं अपनी भावनाओ को 
शब्दों में कैसे बयां करूँ ?

दीप्तमान हैं कुछ शब्द
लफ्जो पर हर सहर
प्रतिबिम्ब बन उन
लफ्जो को जो समझ सकें
उनका तहे दिल से मैं
कैसे शुक्रिया अदा करूँ ?
पर जो समझे ही नहीं
उनका कैसे पता करूँ ?
मैं अपनी भावनाओ को
शब्दों में कैसे बयां करूँ ?

- दीप्ति शर्मा 
                                                     
                                                            

Tuesday, March 29, 2011

जिन्दगी


उलझनों में जीती हुए मैं,
जिन्दगी को तलाश रही हूँ|
जगती हुई उन तमाम
अडचनों के साथ मैं खुश
रह जिन्दगी निखार रही हूँ |

बेवजह की उस उदासी का
जिक्र चला यादो की चादर से
खुद को पहचान रही हूँ|

गम भुला के दिल की उन
उम्मीदों को दिल मे बसा
तेरी यादों को ठुकरा रही हूँ |

जीने की चाह मे आह को भूला
चेहरे के तासुर  में गम छिपा
जिन्दगी को तलाश रही हूँ |

- दीप्ति शर्मा