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Thursday, April 5, 2012

"मेरी लाचारी या तुम्हारे लिए मेरा प्रेम..."????


मैं तुम्हें भुलाने की रोज़ कोशिश करता हूँ...
विश्वास  मानो मेरा..
के खुद को तुम्हारे ख्यालों से बहुत दूर ले जाऊं 
ये रोज़ कोशिश करता हूँ...

पर---
तुम्हें दिल से निकलता हूँ तो तुम दिमाग में बस जाती हो...
        दिमाग से निकलता हूँ तो तुम जिस्म में बस जाती हो...
        जिस्म से निकलता हूँ तो तुम निगाहों पे बस जाती हो...
        निगाहों से निकलता हूँ तो हूठों पे बस जाती हो...!!!

पता नहीं आज क्या हो चला है...
दिल आज क्यूँ बहक रहा है...
रातें सुलग रही हैं
दिन क्यूँ चहक रहा है....!!!

क्यूँ आज फिर दिल बच्चा हो जाने को करता है..
क्यूँ आज फिर तुमसे लिपट कर रोने को दिल करता है...
क्यूँ आज फिर तुम्हारे नाम पर मुस्कुराने को दिल करता है...
क्यूँ आज फिर तुम्हारे गोद में सर रखकर सोने को दिल करता है...
क्यूँ आज तुम्हारे आखों में डूब जाने को दिल करता है...
क्यूँ आज तुम्हारे बातों में खो जाने को दिल करता है...!!!!???

क्यूँ आज तुम्हे जी भर कर देखने का मन हो रहा है मुझे...
क्यूँ आज तुमसे मिलने का मन हो रहा है मुझे...
क्यूँ आज फिर तुम्हे i love u  कहने को दिल चाहता है...
क्यूँ आज फिर तुमसे i love u  सुनने को दिल चाहता है...
क्यूँ आज फिर तुम्हे छुने को दिल चाहता है...
क्यूँ आज फिर तुम्हारे लिए घंटो इंतज़ार करने को दिल चाहता है...!!!!???

क्यूँ आज फिर अच्छा पहनने को दिल चाहता है...
क्यूँ आज  फिर अच्छा दीखने को दिल चाहता है...
क्यूँ आज फिर से बारिश में भीगने को दिल चाहता है...
क्यूँ आज फिर से सपने बुनने को दिल चाहता है...
क्यूँ आज फिर से मुस्कुराने को दिल चाहता है...!!!!???

क्यूँ आज फिर से ज़िन्दगी पे खुश होने को दिल चाहता है...
क्यूँ आज फिर बाहें फैलाकर गाने को दिल चाहता है...
क्यूँ आज फिर से तुमसे प्यार करने को दिल चाहता है...
क्यूँ आज फिर से जीने को दिल चाहता है...!!!!????

आज शायद अपने दिल पर मेरा कोई काबू नहीं...
आज शायद अपनी भावनाओं पर मेरा कोई वश नहीं...

के दिल तो बच्चा होता है...
और गलतियाँ कर बैठता है...

पर पता नहीं...
तुम मेरी इन गलतियों का क्या निष्कर्ष  निकालोगे---
"तुम्हारे लिए मेरा प्रेम या मेरी लाचारी... "
ये तो तुम ही मुझे बतलाओगे  !!!

Monday, April 2, 2012

सिर्फ तुम ही हर बार लौट कर क्यों आती हों

सिर्फ तुम ही हर बार लौट कर क्यों आती हों 
आखिर तुम क्यों इतना सब कुछ सिखलाती हों 
'मनी' क्यों इतनी वफादार हों तुम '''''''''समस्या      
-------------------------------------मनीष शुक्ल   

Saturday, March 31, 2012

अंधेरे ....!

आओ, सिमट जाएं, हम
अंधेरे में ...
जब -
उजाला होगा
तब -
फिर चल पड़ेंगे ...
सच !
मान जाओ, बात मेरी
ये अंधेरे, यूँ ही नहीं होते....... !!
  
-- मित्र श्याम उदय जी की रचना  !

Wednesday, March 28, 2012

यकीन



वह तो मैं था,
जो तेरी बातों पर,
करता रहा यकीन।
लोग तो जमाने में,
सच बातें भी,
कहां मानते हैं।



  • रविकुमार बाबुल


चित्र : साभार गूगल

Sunday, March 25, 2012

रिश्तों की आग बुझाने बैठे हो तुम


दोपहर में बुझा-बुझा सा है सूरज आज।
देखा जब, टूटा दीपक का ख्वाब आज।

कल अंधियारा सौंपा था उसने मुझको,
और पराया हुआ अपना ही साया आज।

रिश्तों की आग बुझाने बैठे हो तुम,
मैंनें इक चिंगारी सुलगाई  है आज।

कुछ दूरी थी अन्तर्मन की, करीब मैं आया,
मंजिल भूला, राह भटका मैं फिर आज।

सौंधी मिट्टी, महकते फूल, चहकते पंछी,
इनमें बस तू ही तू मुझको दिखता है आज।
  •  रविकुमार बाबुल


चित्र : साभार गूगल

Friday, March 23, 2012

"प्यार हो गया है..."

जब से उन्हें देखा है 
          कुछ हो सा गया है
रातों को नींद नहीं
          दिन का चैन नहीं

               ये क्या हो गया है  ???
               क्या प्यार हो गया है  !!!

उसके नाम से धड़कता  है दिल 
          तड़पता है दिल
उसके सपने देखा करता है दिल
          उसकी यादों में खोया रहता है दिल

               ये क्या हो गया है  ???
               क्या प्यार हो गया है  !!!

क्या नज़र थी उसकी
          क्या अदा थी उसकी
क्या देखती थी वह 
          क्या चलती थी वह

               ये क्या हो गया है  ???
               क्या प्यार हो गया है  !!!

मिलने को उनसे
          दिल बेक़रार रहता है
प्यार के इजहार को
          दिल बेक़रार रहता है

               लगता है सच मुझे कुछ हो गया है  !!!
               शायद मुझे प्यार हो गया है  !!!


Saturday, March 17, 2012

"तेरी अंगूठी"


मेरे पास आज भी तेरी 
        एक जिंदा निशानी है 
मेरे हर सांस में बहती 
         बस तेरी रवानी है
तुम्हे याद न हो शायद
         मैं तुम्हें बताता हूँ
तेरी दी हुई "अंगूठी" ही
         बीते यादों की निशानी है....

एहसास आज भी तेरा 
        बहता रगों में लहू बनकर
तुम दूर हो नहीं सकती
       ये बात तुम्हे बतानी है
तुम्हें भूलूं तो कैसे मैं ,
        इजाजत है नहीं मुझको
तुझे भूलने की सोचूं  तो
        भी तेरी याद आती है...

तुने दूर जाने को कहा
        सो लो मैं चला गया
लगा ज़िन्दगी रुक सी गयी 
        ये बात तुम्हे बतानी है
अब साँस तो बस मेरी 
        तेरी याद में चला करती है
इन आखों में तो बस 
        तेरी तस्वीर बसा करती है....

मेरे पास आज भी तेरी 
        एक जिंदा निशानी है
तेरी दी हुई "अंगूठी" ही
        बीते यादों की रवानी है !!!!

मेरा स्वप्न: उगते पंछी

Friday, March 16, 2012

क्यूंकि मैं एक लड़का नहीं


क्यूंकि मैं एक लड़का नहीं,
तो क्या मेरी भावनाएं मेरे आंसू कुछ भी नहीं?
क्या मैं एक पत्थर हूँ?
तुमने झुकाना चाहा तो झुक गयी,मनाना चाहा तो मान गयी,
क्या मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं?
या ये मेरा घर ही नहीं और मुझे बोलने का कोई अधिकार ही नहीं?
मुझे इंसान से एक पत्थर बना डाला
जिसे खुद से जीने का कोई अधिकार नहीं
 मैं तो तुम्हारे हाथ की कठपुतली हूँ
जैसे  तुम  चाहो नचा लो
मेरी भावनाएं और मेरे आंसू कुछ भी नहीं
क्यूंकि मैं एक लड़का नहीं

Thursday, March 15, 2012

प्यार


तुम कहते हो,
तुम्हें मुझसे प्यार नहीं रहा।
तब इक बार,
क्यूं नहीं कह देते हो,
तुम, मुझसे,
‘मुझे तुमसे नफरत है’।
मैंनें तुम्हारे प्यार पर,
किया है विश्वास।
तुम्हारे नफरत पर भी,
 यकीन कर लूंगा।

  •  रविकुमार बाबुल
चित्र : साभार गूगल