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Monday, September 16, 2013

......... कील :))

कारीगर ने
कील का सही उपयोग किया
लकड़ी के टुकड़ों को जोड़ कर
एक टेबल बना दिया //

कील ने भी
नहीं बिगड़ने दी उसका स्वरुप
दर्द सहकर भी //

दूसरी तरफ
एक नासमझ ने
कील को फेक दिया सड़कों पर
इस बार कील ने
स्वम दर्द नहीं सहा
बल्कि ...
कितनो को घायल कर गया //


21वी सदी का इन्द्रधनुष ब्लॉग से बबन पांडये जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ.....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 

Wednesday, August 28, 2013




कृष्ण तुम मेरे सारथी हो 

तुम रहते हो मेरी वार्डरोब में
काले रंग की उन साड़ियों में

जिन्हें खरीदा है मैंने
दिल्ली, मद्रास, हैदराबाद के बाज़ारों से
जब-तब लिपट जाते हो मेरे तन से
कृष्ण तुम मेरा आवरण हो

तुम बहते हो मेरे घर के नलकों में
जिनसे आता है यमुना का पानी
रोज़ कतरा कतरा पीती हूँ तुमको
कृष्ण तुम मेरा जीवन हो

तुम्हे बजते हो मेरे कानो में
जब जब सुनती हूँ एफ एम
कई गीतों ऐसे भी होते हैं
जिनमे एक सुर बासुरी का होता है
कृष्ण तुम मेरा मनोरंजन हो

कृष्ण तुम मेरी नोटबुक हो
तुम्हारे सिधान्तो के सहारे
मोटीवेशनल गुरु समझाते हैं अपनी बात
वो मानते हैं कि
तुम्हारी नीतियों के आगे शून्य है
कॉरपोरेट की पूरी दुनिया
तुमने कुरुक्षेत्र में जो कहा था
वो केवल अर्जुन के लिए नहीं था
इसीलिए तो आईआईएम और आइआइटी ने
किताबों में सहेज लिए हैं तुम्हारे मंत्र
कृष्ण तुम मेरा सेलेबस हो

कृष्ण तुम ट्राफिक की लाल हरी बत्ती हो
जीवन की आपाधापी में
जब विचारों का ट्राफिक जाम हो जाता है
जब मुश्किल हो जाती है अपनी राह पहचानना
तब याद आती है गीता
तब खुले हैं ज्ञान के द्वार
तब दिखता है रास्ता
कृष्ण तुम मेरे सारथी हो
================== अरशाना अज़मत 

Sunday, August 25, 2013



ये मेरी नाराजगी है भारतीय अर्थवय्वस्था व सैन्य वयवस्था को लेकर व तमाम देश के व समाज के ठेकेदारों के प्रति .

मनी'थक गया है झुक गया है कोई लूट रहा है
किसी ने सच कहा है हिंदुस्तान अब टूट रहा है

वतन पे मिटने वालो का जो वतन पे पहरा है
मनी'देख रहा हु साथ उनका भी अब छूट रहा है

गाली है तू कैसे कहू तुझको मै नेता वतन का
मनी'लूट कर मेरा वतन तू कहा अब फूट रहा है
=================मनीष शुक्ल

Wednesday, August 21, 2013

मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ

खुद से जीतने की जिद है, मुझे खुद को ही हराना है 
मै भीड़ नहीं हूँ दुनिया की, मेरे अन्दर एक ज़माना है 

मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 
डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
अजीब हाल है इस दुनियादारी का 
ये सारे हाल तेरे हाल पर ही छोड़ता हूँ 

डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 
डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 

टूटने दो टूटने के बाद ही तो कुछ बनेगा 
छूटने दो छूटने के बाद ही तो वो मिलेगा 
एक परिंदा है अभी जिंदा मुझमें कहीं थोडा बहुत 
उड़ने दो उड़ने के बाद ही तो वो कहेगा 

मै मलंग, बनके पतंग 
अपने फलक को चूमता हूँ 

डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 
डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 

अजीब हाल है इस दुनियादारी का 
ये सारे हाल तेरे हाल पर ही छोड़ता हूँ 


चाहता हूँ  मै भी उड़ना और तैरना 
चाहता हूँ  मै भी नाचूँ बनके झरना 
तोड़ दूं जंजीर जिनसे मै बंधा हूँ 
चाहता हूँ लिख दूं हवा पे नाम अपना 

चाहता हूँ इस कदर,
इसी चाह में मै झूमता हूँ 

डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 
डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 

अजीब हाल है इस दुनियादारी का 
ये सारे हाल तेरे हाल पर ही छोड़ता हूँ 

Friday, August 9, 2013

"शब्द सवेरे के, अब तक ताज़े हैं "

साँझ के 
झुटपुटे की पंक्तियों में, 
शब्द सवेरे के,

अब तक ताज़े हैं 
चलो, गुलदस्ता बना लेते हैं एक और,
जिंदगी के लिए; 

किसी 
झिडकन के साथ, 
बरसी है
बारिश ये अभी,
कुछ बूंदे हथेली पर, 
कुछ माथे पर हैं, 
अथक श्रम कर रही है जिंदगी ये 
जिंदगी के लिए; 

जो है 
लुटाने को उसे है  तत्पर,
ये मुट्ठी खुल रही है 
पालने  से पैरों  तक का 
सफ़र तय किया है,
अब कितनी अकलमंदी से 
गवां रहे हैं जिंदगी को, 
जिंदगी के लिए

थोड़ी इसे भी राहतें  बख्शें, 
थोड़ी सी धडकनें 
इसकी भी रह सकें साबुत,, 
सिफ़र  कर दें कभी तो चाहतों को 
शेष रख लें कभी तो थोडा समय 
बेनज़र  सी गुजर जाती हुई इस 
जिंदगी के  लिए;

एक चिड़िया 
सुबह जो चहकी थी, 
अभी भी शाख पर दिल की,
वक़्त की दालान में बैठी है 
एक हाथ का ही फासला ये 
चाहें तो फिर से एक बार 
थोड़ी सी गुनगुनाहट लें सहेज,
थोड़ी से चहचहाहट  
जिंदगी के लिए.   

Wednesday, July 31, 2013

रीढ़ की हड्डी नहीं गिरवी रखी, इसलिए ये सर तना है दोस्तों




गाँव से शहर आकर सादादिल लोगों को अक्सर शहर बड़ा लुभावना और शहरी तेजतर्रार लगते हैं... फिर याद आता है कि अब गाँव में भी गाँव कहाँ रहा है...गंवई राजनीति खून-खराबे, चौपालों के छल और भेदभाव सब भुलाकर... वो जीना चाहता है...शहर को जीतना चाहता है...आगे बढ़ना चाहता है....लेकिन कैसी जीत??? जो अपना ईमान दांव पर लगाकर मिले वो जीत भी भला जीत है???... श्री सी एम त्रिपाठी जी की इन चंद पंक्तियों में गाँव से आकर शहर में बसे किसी ऐसे ही आदमी की पूरी की पूरी ज़िन्दगी हैं.. पत्रकारिता के शुरूआती दिनों में मुझे कुछ माह उनसे सीखने का मौका मिला...खुशनसीबी है मेरी कि मैं उन्हें बापू जी कह पाती हूँ...

गाँव भीतर से घुना है दोस्तो

शहर लोहे का चना है दोस्तों 

उस महल के द्वार पर दस्तक न दो
वो सियासत से बना है दोस्तों

जो हमारा ही लहू पीता रहा
वो हमारा सरगना है दोस्तों

रीढ़ की हड्डी नहीं गिरवी रखी
इसलिए ये सर तना है दोस्तों

सी एम त्रिपाठी

Monday, July 29, 2013

अब वक्त की ठोकर पे खड़ा सोच रहा हूं



संक्षिप्त परिचय: मीडिया में करीब 18 साल से अपनी सेवाएं दे रहे श्री सी एम् त्रिपाठी मीडिया के ग्लैमर से कई मील दूर हैं... इनकी रचनायें तमाम मंचीय कवियों और रचनाकारों को ठेंगा दिखाती हैं... शब्दों और भाषा की मजबूत पकड़ रखने वाले श्री त्रिपाठी स्वतंत्र भारत में फीचर डेस्क प्रभारी के पद पर हैं... मीडिया में शराफत को सहेजकर चल रहे त्रिपाठी जी की खाली जेबें सिर्फ और सिर्फ सम्मान से भरी हैं... पैसे की कमी के कारन उनका अभी तक कोई रचना संग्रह नहीं आ सका है... कविताबाज़ी में हम लगातार उनकी कवितायेँ प्रकाशित करेंगे...ताकि आपतक ऐसे मसिजीवी भी पहुँच सकें जो धन की दीवार के पीछे छिप गए हैं....





सीने में ऐतबार के खंजर उतर गए
बरता जो ऐहतियात तो साये से डर गए

अब वक्त की ठोकर पे खड़ा सोच रहा हूं
दुःख दर्द मेरा बांटने वाले किधर गए

शायद कि मिल ही जाये सुकूं दोस्तों के बीच
पूछो न इस तलाश में किस किस के घर गए

गिरना ही था तो एक नहीं सौ मुकाम थे
ये क्या किया कि आप निगाहों से गिर गए

चंद्रमणि त्रिपाठी (सी एम त्रिपाठी)

Saturday, July 13, 2013



यारी है ईमान मेरा
यार मेरी जिन्दगी ...यारी है

LARGER PERSONALITY THAN LIFE

प्राण साहब अपने अभिनय के लिए हमेशा याद किए जायेंगे. बॉलीवुड को लगातार उनकी कमी खलेगी वो मात्र एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने अपने नकारात्मक किरदार सकारात्मक वेश भूषा में किया 320 फिल्मो में 200 से ज्यादा गेटप अपनाए. प्राण ने Unnao, Uttar Pradesh ,से प्राइमरी की शिक्षा ली और उत्तर प्रदेश के तमाम शहरो में रहे .प्राण एक एक्टिविस्ट भी थे आपातकालीन के दौरान उन्होंने इंदिरा सरकार का विरोध किया था. निजी जिन्दगी में प्राण बेहद उम्दा इंसान थे
उन्होंने अमिताभ बच्चन की कई बार मदद भी की थी

भावपूर्ण श्रधान्जली
कविताबाज़ी 

Wednesday, June 5, 2013


स्मरण / नूतन ( 4 जून, 1936 - 21 फरवरी, 1991 )
पारंपरिक भारतीय सौंदर्य और सरलता की प्रतिमूर्ति नूतन हिंदी सिनेमा के पांचवे और छठे दशक की एक बेहद प्रतिभाशाली और भावप्रवण अभिनेत्री रही हैं। परदे पर भारतीय स्त्री की गरिमा, ममता, सहृदयता, विवशता, तकलीफ और संघर्ष को जिस जीवंतता से उन्होंने जिया है, उसे देखना हमेशा एक दुर्लभ सिनेमाई अनुभव रहा है। नूतन ने चौदह साल की उम्र में अपने फिल्मी सफर की शुरूआत 1950 में अपनी मां और चौथे दशक की अभिनेत्री शोभना समर्थ द्वारा निर्देशित फिल्म 'हमारी बेटी' से की थी, लेकिन उन्हें सफलता और ख्याति मिली 1955 की फिल्म 'सीमा' से जिसमें बलराज सहनी उनके नायक थे। नूतन ने 70 से ज्यादा फिल्में की थी, जिनमें प्रमुख हैं - सीमा, हमलोग, आखिरी दाव, मंजिल, पेइंग गेस्ट, दिल्ली का ठग, बारिश, लैला मजनू, छबीली, कन्हैया, सोने की चिड़िया, अनाड़ी, छलिया, दिल ही तो है, खानदान, दिल ने फिर याद किया, रिश्ते नाते, दुल्हन एक रात की, सुजाता, बंदिनी, लाट साहब, यादगार, तेरे घर के सामने, सरस्वतीचंद्र, अनुराग, सौदागर, मिलन, देवी, मैं तुलसी तेरे आंगन की, साजन की सहेली, मेरी जंग, कर्मा आदि। उत्कृष्ट अभिनय के लिए उन्हें आधा दर्ज़न 'फिल्मफेयर' पुरस्कार मिले थे। जन्मदिन पर इस विलक्षण अभिनेत्री को श्रधांजलि, उनकी फिल्म ' सोने की चिड़िया ' के इस कालजयी गीत के साथ !

रात भर का है मेहमां अंधेरा
किसके रोके रुका है सवेरा

आ कोई मिलके तदबीर सोंचे
सुख के सपनों की ताबीर सोंचे
जो तेरा है वही ग़म है मेरा
किसके रोके रुका है सवेरा

रात जितनी भी संगीन होगी
सुबह उतनी ही रंगीन होगी
ग़म न कर गर है बादल घनेरा
किसके रोके रुका है सवेरा !


रात भर का है मेहमां अंधेरा किसके रोके रुका है सवेरा 
आ कोई मिलके तदबीर सोंचे सुख के सपनों की ताबीर सोंचे जो तेरा है वही ग़म है मेरा किसके रोके रुका है सवेरा 
रात जितनी भी संगीन होगी सुबह उतनी ही रंगीन होगी ग़म न कर गर है बादल घनेरा किसके रोके रुका है सवेरा !

Wednesday, May 8, 2013

संघर्ष का दूजा नाम ही तो जवानी है





मुखौटों ने अपनी शक्लें पहचानी हैं 

इसीलिए तो आईने से आनाकानी है 

परछाईं भी घटती बढती है पल पल 
खुद के दम पर नैया पार लगानी है 

अंधियारे की रात भयानक आई है 
जुगुनुओं की बरात हमें अब लानी है 

संविधान के खातिर खाकी खादी ने 
जो खायी थी कसमें याद दिलानी हैं 

टूटो-छूटो फिर से संवरो और डट जाओ 
संघर्ष का दूजा नाम ही तो जवानी है 


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