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Thursday, August 4, 2011

हम तो हँसते जा रहे थे



जिंदगी के अब तो सारे पर्त खुलते जा रहे थे,
हम उनमें और भी यूँ ही उलझते जा रहे थे,
देखना होता किसी कोतो देख लेता दर्द मेरा,
हम यही सोचकर बस यूँ ही हँसते जा रहे थे॥


Wednesday, August 3, 2011

बार बार ये दिन आये जन्मदिन की बधाई......संजय भास्कर

Er. Parveen Bhaskar
उतरी हैं आंगन में,
किरणें सुनहरी
लेकर बधाई
जन्‍मदिन की
समेट लो इनको
खुशियों के संग  ....

फूलों से तुम खुश्‍बू
लेना जीवन 
के हर लम्‍हें
सुवासित हो जायें
बड़ो का आशीष मिले
जब स्‍नेह से
हम परिभाषित हो जायें ...

हर शब्‍द मेरे दिल की दुआ,
तुम्‍हारे लिये
बन के आज सौगात में
आये हैं
तुम्‍हारा हर स्‍वप्‍न पूरा हो
जो अधूरा हो वो
साकार हो जाये........................!

आज मेरे छोटे भाई प्रवीण भास्कर का जन्मदिन है सोचा अपने कविताबाजी ब्लॉग के सभी मित्रो से साँझा कर लू , मेरी ओर से भाई को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं  वो जिंदगी में हर मुकाम को प्राप्त करे और हर ऊँचाई को पाये मेरी यही कामना है 
मेरी शुभकामनाएँ उसके साथ है !

****** HAPPY BIRTHDAY TO YOU ******
         
-- संजय भास्कर 

बधाई ....... पत्र !


बधाई ....... पत्र !

प्रिय ,गांवली ... मेरा बधाई ..... पत्र ..स्वीकार करो 








आज का दिन 
मंगलमय हो ! 
०४ अगस्त ....
जन्म दिवस की हार्दिक बधाई ....
















आज .. का दिन 
यादगार का दिन है 
जीवन की इतिहास का दिन है 
पर मै तुम्हारे साथ ,उत्सव नहीं माना पाउँगा
बरसो की यादों को ,बीते लम्हों को 
बस ,अतीत में झांकर 
हंस लूंगा 
जो बिताये थे जीवन के पल, उस पल को याद कर 
हँसते हुए ...दूर से तुम्हे देख लूंगा 
हम जीवन बंधन में न बंध सकें तो क्या हुआ 
हमारा प्रेम ... तो जीवित है 
जैसे ..मीरा की प्रेम ....
आज ..तुम २१ वर्ष की ...
ओर कदम आगे बढ़ा रही हो ..
जीवन की नई डगर ,नई उमंग तुम्हारे पास है 
आगे बढ़ो ...
नई इतिहास रचो 
प्रेम ,का अर्थ ही त्याग है ....
जन्म दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं !....

लक्ष्मी नारायण लहरे "साहिल "

चाहत इनमें भी है


Image from http://www.indianorphanages.com/



ये जो अनदेखे, छोटे बच्चे हैं,
दुनिया में सबसे अच्छे हैं,
एक बार इन्हें मौका तो दो,
आसमाँ छूने की ताकत इनमें भी है॥

भूख ने इन्हे बेहाल कर रखा है,
हमने इन्हें बदहाल कर रखा है,
इक हाथ पकड सहारा तो दो,
कुछ बनने की चाहत इनमें भी है॥

टिमटिमाता दिया हैं ये जीवन का,
कसम खाई है जलते रहने की,
इनके हिस्से का इनको तेल तो दो,
देश जगमगाने की हिम्मत इनमें भी है॥

ये देश जहाँ कुत्ते पाले जाते हैं,
बडे प्यार से सम्हाले जाते हैं,
इनके हिस्से का प्यार इनको तो दो,
थोडा प्यार पाने की हसरत इनमें भी है॥

जिन्दगी शायद अजीब इत्तफ़ाक है,
इंसान की हैवानियत का जबाब है,
कुत्ते महलों में रहा करते हैं,
मानव सडकों पर सोया करते हैं॥

महलों में रहने वाले खुद को,
शायद कुत्ता या नेता कहते हैं,
भविष्य देश के, फ़ुटपाथों पर,
जीने की कोशिश करते रहते हैं॥

ये कोशिश अथाह चला करती है,
बिन जल मछ्ली, जिया करती है,
इन्हे बचाने हित इक बूदँ तो दो,
थोडा जीने की चाहत इनमें भी है॥

किस्मत साथ नहीं फ़िर भी,
लडने की ख्वाइस रखते हैं,
एक भले ही रोटी हो, पर,
देने की गुंजाइस रखते हैं॥

बस पैर रखने की जमीं तो दो,
ऊँचा उडने की ताकत इनमें भी है,
इनके हिस्से का इनको तेल तो दो,
रोशनी देने की हिम्मत इनमें भी है॥

(ये अनाथ बच्चे नहीं, इन्हीं मे से कुछ देश के सबसे चमकते सितारे बनेंगे।)



जिद्


तमाम मिन्नतों के बाद,
जब बिछड़ते हुये दी थी तुमने,
हां कहकर साथ हो जाने की इजाजत,
सो... कैसे लौटता मैं पीछे,
उसूल नहीं था मेरा?
शायद तुम्हारी ताकत भी जाती रही थी,
जो बढ़कर पकड़ लेती हाथ मेरा।
चलो तन्हाई में ,
तय करेगें हम दोनों,
इस जिद् में,
तुम्हें क्या मिला?
और मैनें क्या खोया?

रविकुमार बाबुल

इंतजार


किश्तों में इंकार,
किया तुमने।
और किश्तों में किया हमने,
इकरार का इंतजार।

रविकुमार बाबुल

हम तो यूँ जिया करते हैं


हम तो यूँ  जिया करते हैं
लहरों मे बहा करते हैं
कस्तियाँ भी घबरा जाये
हम इस तरह सेलाबो में
साहिल से मिला करते हैं
हम तो यूँ जिया करते हैं |
हरपल  खुश रहकर
आकाश कि सोच रख
ऊचाई छुआ करते है
हम तो यूँ जिया करते है |
कदम अपने सम्भाल
रास्तो पे चला करते हैं
मंजिलो को पाने की हम
कोशिशे किया करते हैं
हम तो यूँ जिया करते हैं |
खुद को रुला अपनी हंसी
दुनिया को दे ख़ुशी से
अब मस्त रहा करते हैं
हम तो यूँ जिया करते हैं |
नदी से निकल सागर की
गहराई से मिला करते हैं
अब हम वक़्त के साथ
उम्मीद लिए चला करते हैं
हम तो यूँ  जिया  करते हैं |
-दीप्ति शर्मा 

Tuesday, August 2, 2011

इम्तिहान.....

कविता

हे प्रभु ! इस दास की इतनी विनय सुन लीजिए
लात,जूता,मार थप्पड़ पास बस कर दीजिए
मैं डरता नहीं प्रलय या मौत के तूफ़ान से
बस मेरी रूह कांपती है इम्तिहान से
सवेरा हुआ इम्तिहान में प्रश्न-पत्र था भूगोल का
और उसमें एक प्रश्न था, गोल है कैसे धरा ?
मैंने भी एक पल में लिख दिया उत्तर खरा
गोल है चूड़ी, कचौरी र पापड़ भी गोल है
गोल है रसगुल्ला,जलेबी और लड्डू भी गोल है
इसलिए शिक्षक महोदय यह धरा भी गोल है,
देख उत्तर खोल कर शिक्षक हँसे जी खोलकर
गोल है दवात तेरी लेखनी भी गोल है
इसलिए बेटा तुम्हारे नम्बर भी गोल है
रोज मच्छर रात को कहता यही है कान में
होश करके बैठना इस बार इम्तिहान में.....!

:-- नीलकमल वैष्णव "अनिश" --:
            उपाध्यक्ष
छत्तीसगढ़ लेखक संघ
(लेखक संघ कोसीर)

www.neelkamalkosir.blogspot.com 

अच्छा किया दगा दी तूने



अच्छा किया दगा दी तूने,
इस जिन्दगी को सजा दी तूने,
अपनी कीमत भूल गया था,
मेरी औकात बता दी तूने॥

अच्छा किया दगा दी तूने,
मेरी हर चीज़ ठुकरा दी तूने,
जीने की राह बना दी तूने,
अक्ल मुझे सिखा दी तूने॥

इक तजुर्बा था ये दुनिया का,
सब सिखाने की दया की तूने,
ये सच है या केवल लगता है,
तुझे चाहने की सजा दी तूने॥

जिन्दगी वैसे भी खुशनशीब थी,
तुझे पाने के बहुत करीब थी,
अब तेरे बिना मर भी कैसे जाऊँ,
क्यूँ ये जीने की वजह दी तूने ?

अच्छा किया दगा दी तूने।

जज्बात ...

एक घर सपनों की 
न जाने मन में कब से बनाकर रखा हूँ 
उस घर की दीवार विश्वाश पर टिकी है 
मेरे आंसुओं से बनी है उसकी छत 
मेरे अरमानो की बगिया सजी है 
उस छोटे से घर में 
न जाने कितने बरस लगे हैं 
कुछ लोगों के झूठे स्नेह 
कुछ लोग मजाक उड़ाते हैं 
मेरे जज्बात ...को भी 
वो हंसी से नहीं ,बल्कि तानें दे - देकर 
ऊँची आवाज से चिढाते हैं 
उनके अतीत का मैं एक हिस्सा हूँ 
शायद भूल गए हैं वो मैं वही टहनी हूँ 
जिससे वो अपना 
आलिशान महल बनाये हुए हैं 

लक्ष्मी नारायण लहरे "साहिल "
युवा साहित्यकार ,पत्रकार 
कोसीर ...ग्रामीण मित्र !