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Monday, June 6, 2011

होना ही था




यह तो होना ही था।
तुझको तो खोना ही था।

मेरा ख्वाब थीं तुम लेकिन,
ख्वाब, ख्वाब होना ही था।

सौंप दिया तुझको सब कुछ,
दिल को रोना ही था।

मैंने कहा नहीं इश्क, तुझको
मुहब्बत कहां होना ही था।

बिछडऩे की सजा मेरे हिस्से,
तुझको बरी होना ही था।

रविकुमार सिंह
http://babulgwalior.blogspot.com/

गजल




पाक दिल जो होता है आदमी।
जख्म वही अपने लिखता है आदमी।

कभी-कभी शब्द होते हुये भी,
तब मौन क्यूं रहता है आदमी।

रिश्ते जब भटक जायें रास्ता अपना,
यूं रिश्तें क्यूं तोड़ता है आदमी।

यादें ले जाना, जब जाना तुम,
वर्ना रोज-रोज मरता है आदमी।

मुद्दतों सोचा सांझा कर लूं बातें पर,
कब दिल की सुनता है आदमी।

रविकुमार सिंह
http://babulgwalior.blogspot.com/

मैं अनपढ़ा रह गया?


पीड़ा

कब मांगा था मैंने,
तुमसे तुम्हारा जिस्म?
कब की थी चाह या कोशिश
तुम्हें छूने की मैंने?

चाहा था तो बस इतना,
तुम्हें इतना पवित्र रख सकूं?
तुम्हारी पूजा भी कर लूं,
तुमसे ही मन्नतें भी मांग सकूं?
लेकिन देर से समझा मैंने,
मंदिर में किसी मूर्ति का खण्डित होना,
कितनी पीड़ा देता है,
आस्था को?
आज मेरा विश्वास भी
उतना ही दर्द दे गया मुझको,
तुम्हारे साहित्यिक दिल,
और पढ़े-लिखे दिमाग के बावजूद,
जब मैं पूरा का पूरा अनपढ़ा रह गया?

रविकुमार सिंह
http://babulgwalior.blogspot.com/

जन्नत


जन्नत

मैं जहन्नुम जाना चाहता हूं,
इसलिये की,
मैं बुरा हूं।
मित्र, तुम गलत हो।
मैं तो जहन्नुम,
इसलिये जाना चाहता हूं?
कि इस धरा पर,
न मैं उसके जैसा हो पाया,
और न वो मेरे जैसा?
शायद,
वहां ही किसी को
अपने जैसा बना दूं।
जहन्नुम को जन्नत बना लूं?

रविकुमार सिंह
http://babulgwalior.blogspot.com/

Thursday, June 2, 2011

इंसाफ



रविकुमार बाबुल


हां मैं अपराधी हूं,
मैंने अपराध किया है,
तुमसे पूछे बगैर,
तुम्हीं से प्यार करने का?

मेरे मुंसिफ हो तुम्हीं ,
प्यार को स्वीकार कर,
मेरे साथ इंसाफ कर देना?
या फिर करके इंकार ,
खुद अपराधी हो जाना?
तुम्हारे इस गुनाह की,
ताउम्र मैं,
सजा काट लूंगा?

Monday, May 30, 2011

कुछ रचनाएं



सच

मैं अपना सच,
छिपा नहीं पाया?
तुम अपना सच
कही नहीं पाये?
आओ हम दोनों आज,
अपने-अपने सच को,
अपनी अंजुरी में रख कर,
अपनी मुहब्बत का अभिषेक करें
तुम मुझे प्रसाद बना देना,
और खुद प्रार्र्थना हो जाना?

प्यार

जिससे मिला नहीं कभी,
उससे प्यार कर बैठा?
जिससे मिलना हुआ मेरा,
उससे भी प्यार कर बैठा?
तुम ही बतलाओ,
किस प्यार के साथ चलूं मैं?
वह जो दूर है,
शायद न चले साथ मेरे।
या वह जो साथ है,
पर शायद न चले साथ मेरे?

नाम

मैंने कभी नहीं लिखा,
उसको दिये तोहफे पर,
अपना नाम।
देखकर मेरा तोहफा,
ताउम्र लिखती रहे,
वह मेरा नाम।
यह कोशिश,
जरूर की है मैंने।

साया

जब हर साया तेरे जैसा है,
फिर तेरा साया खास क्यूं है?
मेरी जिंदगी ने पूछा कई बार,
बस वह शख्स ही खास क्यूं है?

शब्द

भूल गया था अक्षर जोडऩा,
जब तुम जुड़े, सब जुड़ चला।
शब्द की हामी भर लो तुम,
पूरा वाक्य मैं रच लूंगा?

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रविकुमार बाबुल, ग्वालियर
093026 50741

Wednesday, May 25, 2011

मेरा साया


खुद में गुम मेरा साया ,
हो कोई जैसे रंग समाया |

मुग्ध हो कुछ राग अलापे ,
मगरूर हो मंजिल तलासे ,
खुद में गुम मेरा साया ,
हो कोई जैसे रंग समाया |

सुर्खी लिए होंठो पर अपने ,
नये द्रष्टिकोण को अपनाया ,
प्रभात का ये उजियारा ,
खुद में गुम मेरा साया ,
हो कोई जैसे रंग समाया |

सहजभाव से ले संकल्प ,
कुछ क्षण में हैं मूक स्वर ,
उन स्वरों से उऋण,
जिजीविषा को थामे ,
खुद में गुम मेरा साया ,
हो कोई जैसे रंग समाया |
 -दीप्ति शर्मा 

Tuesday, May 24, 2011

वो अपना है बहुत अपना है पर अपनी तरफ नहीं है ,,


वो अपना है बहुत अपना है पर अपनी तरफ नहीं है 
फैसला करना तो आया फैसला अपनी तरफ नहीं है 

मैंने जो खाव्ब देखे थे उसके लिए वो मेरी हद में है 
पर न वो न उसका कोई ख्वाब अपनी तरफ नहीं है


दिल दुखता है मेरा जब सोचता हू उसके लिए 
की वो बहुत अपना है पर अपनी तरफ नहीं है 

 मुझको जो पसंद है वो उसको पसंद नहीं 
उसको जो पसंद है वो अपनी तरफ नहीं है 

आज मै भी बहुत मजबूर हू कुछ कह नहीं सकता 
'मनी'वो बहुत खुश है खुशी पर अपनी तरफ नहीं है 




….. क्या तुम्हें पता है, कि तुम एक जादूगरनी हो !!

 
सच ! तुम हसीन
बेहद ख़ूबसूरत हो
जब तुम्हें देखता हूँ
तो सिर्फ देखते रहता हूँ
तुम्हारी आँखें
उफ्फ़ ! क्या कहूं
अजीब-सी कशिश
अजीब-सा जादू है
जब भी मुझे
देखती हैं ! उफ्फ़
अपना बना लेती हैं !
हाँ ! याद है मुझे
जब तुमने मुझे
पहली बार देखा था
बस ! उसी पल
तुमने मुझे, न चाहकर भी
अपना बना लिया था
वो दिन या आज का दिन
मैं तुम्हारी आँखों के
इर्द-गिर्द ही हूँ
सच ! क्या तुम्हें पता है
कि तुम एक जादूगरनी हो !

शायद ! नहीं
ठीक है, अच्छा ही है
तुम अंजान हो
तुम्हें यह ही यकीं है
कि मैं तुम्हें
बे-इम्तिहां चाहता हूँ
सच ! चाहता तो हूँ
पर अनोखा सच तो
तुम्हारी आँखों का जादू
खैर ! जाने दो
मुझे तो सिर्फ इतना पता है कि मैं तुम्हें बेहद
बे-इम्तिहां चाहता हूँ !! 
चित्र :- ( गूगल से साभार  )
हमारे मित्र  श्याम कोरी  जी की रचना उम्मीद है पसंद आएगी आपको 

Thursday, May 19, 2011

दिल भी गया नजरे गयी वफ़ा भी गयी,,,


डूबे हुए है आज कल वो किसके ख्याल में
फसते ही जा रहे हो जैसे दिलो जाल में 

क्या कर रहे वो कुछ जानते नहीं
बस उलझे हुए वो अपने सवाल में

दिल भी गया नजरे गयी वफ़ा भी गयी
पर बहुत खुश है वो घुस के बवाल में

सब कुछ समझ चुके पर मानते नहीं
बस मस्त है वो अपने इस खेलखाल में

बहुत मजे में है न उनको समझाओ
'मनी' रहने दो छोड़ दो उनके हाल में
......................मनीष शुक्ल