रविकुमार बाबुल
हर रोज,
कुछ शब्दों की पुडिय़ा,
बना कर,
रख लेता हूं,
तुम्हारे लिये।
कभी किसी रोज,
मंदिर जाना हुआ मेरा,
और तुम मिल गये,
सब चढ़ा दूंगा
तुम पर।
मिन्नतें भी तुमसे थीं,
मन्नतें भी तुमसे।
मन का हुआ,
तब मान लूंगा,
मेरे देवता ने सुन लिया,
और न हुआ तब भी,
तुम्हें नहीं,
दोष अपने नसीब को दूंगा।
पर तुम पर चढ़ा कर मैंने,
जिन शब्दों को,
करके पवित्र, बना लिया है प्रसाद,
जिन्दा रहने तक बांटता रहूंगा,
अगले जन्म के पुण्य की खातिर,
तुम्हारी यादों की तरह।





