अगर आप भी इस मंच पर कवितायेँ प्रस्तुत करना चाहते हैं तो इस पते पर संपर्क करें... edit.kavitabazi@gmail.com

Wednesday, May 18, 2011

शब्दों का प्रसाद

रविकुमार बाबुल

हर रोज,
कुछ शब्दों की पुडिय़ा,
बना कर,
रख लेता हूं,
तुम्हारे लिये।
कभी किसी रोज,
मंदिर जाना हुआ मेरा,
और तुम मिल गये,
सब चढ़ा दूंगा
तुम पर।
मिन्नतें भी तुमसे थीं,
मन्नतें भी तुमसे।
मन का हुआ,
तब मान लूंगा,
मेरे देवता ने सुन लिया,
और न हुआ तब भी,
तुम्हें नहीं,
दोष अपने नसीब को दूंगा।
पर तुम पर चढ़ा कर मैंने,
जिन शब्दों को,
करके पवित्र, बना लिया है प्रसाद,
जिन्दा रहने तक बांटता रहूंगा,
अगले जन्म के पुण्य की खातिर,
तुम्हारी यादों की तरह।

मैं कभी नहीं लौटूंगा

रविकुमार बाबुल

थक गया हूं बनाते-बनाते,
अब नहीं बनता है,
रेत का घर,
मुझसे मेरे शहर में।
कुछ यादें या रेत,
छोड़ कर जा रहा हूं मैं,
पास तुम्हारे।
बना लेना,
तुम इससे अपने लिये,
खुशी का एक घर।
घर के आंगन में रख देना,
तुलसी के गमले में
शालिग राम की-सी,
यादें मेरी।
मैं दरिया बनकर,
बह निकल जाऊंगा।
तुमसे बहुत दूर,
तुम्हारे लिये
किनारा रेत का छोड़ कर।
अपने मुताबिक लिख लेना,
तुम मनचाहा नाम इस पर।
मैं कभी नहीं लौटूंगा,
तेरे लिखे नाम पर अपना नाम लिखने,
नदी की तरह।

Tuesday, May 17, 2011

मैं इंतजार करूंगा तुम्हारा


रविकुमार बाबुल

नींद में कुछ ख्वाब,
पलटते रहे मुझे,
और कुछ पुरानी यादें,
मुझे सहलाती रही।
मेरे अश्क तेरे अक्स में,
भींग गये भीतर तक।
तुम फिर भी सूखी रहीं,
तपती दोपहरी की तरह।

परिदें लौटते हैं शाम को
यह सुन चाहा था मैंनें,
तुम्हें चिडिय़ा बनाना।
तुम चिडिय़ा बन जाना,
और लौटके आना सांझ तक,
मैं इंतजार करूंगा तुम्हारा,
दिल के आंगन में
तुम्हारी चहचहाट सुनने को?

मुझसे लड़ता रहता है


रविकुमार बाबुल

वो शख्स आजकल कुछ परेशां रहता है।
कहता नहीं कुछ मुझसे, चुप रहता है।

कुछ ख्वाब, कुछ ख्वाहिशें होगीं उसकी भी,
कागज पर जाने क्या बुनता रहता है।

जो कहा सच नहीं, लिखा सच नहीं,
सच की खातिर मुझसे लड़ता रहता है।

तपते मौसम में, तुम ठण्डी छांव मेरी,
गुम-सुम सा मेरे साथ चलता रहता है।

मेरी हथेली में यकीनन तेरा नाम था,
वक्त रोज नये बहाने गढ़ता रहता है।

Saturday, May 14, 2011

इंतज़ार में तेरे...



इंतज़ार में तेरे ...शब्द मोती से बन गए
ये है तेरी दुआ ........या उसकी मेहर है
कि तुझसे मिला ......ये उसका असर है
जानते है सब .............सबको खबर है
पर तू जान के भी .........क्यों बेखबर है
ये है तेरी दुआ ........या उसकी मेहर है

इकरार में तेरे ..कितने मौसम बदल गए
पर तू भोर मेरा .........तू दोपहर है
कि हूँ आज तनहा...... तू हमसफ़र है
एक झील था मैं...........तू एक लहर है
सब मुझको देखें .........तू मेरी नज़र है
ये है तेरी दुआ ........या उसकी मेहर है

................कुछ फ़र्ज़ भी निभाना है


कुछ काम भी करना है कुछ फ़र्ज़ भी निभाना है ,
खुद को मिटा कर भी ये देश बचाना है |
 जो दुश्मन सीमा पर है उसे मिटा देंगे 
गद्दार जो अन्दर है उनको भी मिटाना है |
कोई धर्म या मजहब हो सब भाई भाई हैं
रूठे हुए भाइयो को सीने से लगाना है |
ये देश सलामत है तो हम भी सलामत है ,
हर देश के वासी को यह याद दिलाना है |
भूंखा न रहे कोई न कोई नंगा हो
ये काम मुश्किल
है  पर करके दिखाना है |
खेतो में हमारे भी सोने के खजाने है ,
इक फसल
मोहब्बत की दिल में भी उगाना है |
ये गर्व हो हर इक को भारत का मै वासी हूँ
इस शान से जीने का अंदाज सिखाना है !


..........संजय भास्कर

Sunday, May 1, 2011

कलम



ये  मेरे साथ रहती है
और सारे दर्द सहती है
पर जिन्दगी से इसे
बहुत हैरानी है
ना ही हँसती ना ही रोती
ये लिखती मेरी कहानी है|
  वो अल्फ़ाज मेरे
  दिल की धडकन के
  सब इसकी जुबानी है
  ये लिखती मेरी कहानी है |
निगरा समझ वो मेरा
सारा जहाँ  बताती है
समझ मुझे लिखा उसने
ये उसकी मेहरबानी है
ये लिखती मेरी कहानी है|
  रुके हुए कुछ झुके हुए
  मेरे अश्कों में उसकी
  हर वक्त निगरानी है
  जब इसकी जुबानी है
  ये लिखती मेरी कहानी है |

-दीप्ति शर्मा

Wednesday, April 27, 2011

जन्मदिन मुबारक हो परियों की रानी......अनुष्का !!

 अनुष्का कि बचपन कि तस्वीर 


ओ लाडली, मेरी छैल छबीली
तितलियों सी है चंचल, फूलों सी रंगीली
परियों की रानी, ओ राजदुलारी
तेरी अदाएँ, जहां से निराली 
नन्हे कदमो ते तेरे, नाचे मेरी खुशियाँ
तेरे आने से रोशन हुई हमारी दुनिया सारी 

 कल मेरी भांजी अनुष्का का जन्मदिन था जो कि पूरे चार साल कि हो गई है 
सोचा अपने कविताबजी ब्लॉग के सभी मित्रो से साँझा कर लू ......

--संजय भास्कर

Thursday, April 21, 2011

मोहब्बत

इस मोहब्बत का नतीजा ब खुदा कुछ भी नहीँ

ऐसी बीमारी है यह जिसकी दवा कुछ भी नहीँ

खो गयीँ तस्वीरेँ तेरी खो गये तेरे खुतूत

ज़हन मेँ अब तेरी यादोँ के सिवा कुछ भी नहीँ

कब मोहब्बत की ज़बां अल्फ़ाज की मोहताज है

मैँने सब कुछ सुन लिया उसने कहा कुछ भी नहीँ

हमने तुझ को हसरतेँ दीँ,चाहतेँ दीँ,जान दी

ज़िन्दगी हम को मगर तुझ से मिला कुछ भी नहीँ

बाल क्योँ बिखरेँ हुए हैँ,क्योँ यह आंखे लाल हैँ

मैँने पूछा क्या हुआ कहने लगा कुछ भी नहीँ

जिन चराग़ोँ की हिफ़ाज़त कर रहे होँ हौसले

उन चराग़ोँ के मुक़ाबिल यह हवा कुछ भी नहीँ

शर्त तो यह है कि पढने वाली आँख हो

कौन कहता है कि चेहरे पर लिखा कुछ भी नहीँ

लिया गया है:
http://premkibhasha.blogspot.com से।

Wednesday, April 20, 2011

जिन्दगी


                            

रात के अँधेरे साये में वो चिडचिडाती  रौशनी कभी राह दिखाती है तो कभी बस आँखों में चुभती सी नजर आती है | यक़ीनन उस रौशनी के भीतर कोई ख्वाब , कोई उम्मीद है जो पल पल जलती है , पर उसी वेग से जगती भी जाती है |
अथाह मन में उत्पन्न हर बात और विचित्र विडंबनाओ से जूझती जिन्दगी , क्या कोई उम्मीद पूरी कर पायेगी या इस रौशनी में इसकी चमक फीकी पड़ जाएगी|
अद्रीश की तरह ऊँचाई का कोई मुकाम पा मेरी जिन्दगी  आज किसी तारे की तरह आकाश में टीमटीमाएगी या धूमिल हो कोई अकस्  बन रह जाएगी |
हर एक चाह की तपिश  में तप, मेरी उम्मीद एक नयी राह दिखाएगी |
कभी रौशनी में जिन्दगी पिलकायी जाएगी तो कभी दिल की गहराई से नापी जाएगी | साथ ले अपना अक्स बस चलती ही जाएगी |
कभी आत्मा को झकझोर देगी तो कभी पत्थरो से टकरा उड़ती चली जाएगी |
कभी अपनी  मुस्कान  में खुद  को जान  उस उम्मीद को पहचानने की आस  से उसका असर देखेगी  , तो कभी हर एहसास  के साये  में खुद को दिखा  शांत  नज़रों से कुछ  खोजेगी | 
क्या मेरी जिन्दगी ,
हर रौशनी में मेरा साथ देगी ?
या मुख्तलिफ़ हो मुझसे विस्मृत  हो जाएगी |
ये मेरी जिंदगी अंजोरी बन , मेरी हर राह आसान बना , हर अँधेरे साये की रौशनी को फांद बहुत दूर साथ निभाएगी |
बस मेरे साथ चलती जायेगी |

- दीप्ति शर्मा