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Saturday, September 5, 2015

सपरिवार कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ :-)


कविताबाज़ी ब्लॉग  की ओर से आप सभी ब्लोगर मित्रों को सपरिवार
 कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ .....!!


-- संजय भास्कर 

Friday, August 14, 2015

खाली पड़ा कैनवास -- शिवनाथ कुमार :)

@फोटो : गूगल से साभार

उस खाली पड़े कैनवास  पर
हर रोज सोचता हूँ
एक तस्वीर उकेरूँ
कुछ ऐसे रंग भरूँ
जो अद्वितीय हो
पर कौन सी तस्वीर बनाऊँ
जो हो अलग सबसे हटकर
अद्वितीय और अनोखी
इसी सोच में बस गुम हो जाता हूँ
ब्रश और रंग लिए हाथों में
पर उस तस्वीर की तस्वीर
नहीं उतरती मेरे मन में
जो उतार सकूँ कैनवास पर
वह रिक्त पड़ा कैनवास
बस ताकता रहता है मुझे हर वक्त
एक खामोश प्रश्न लिए
और मैं
मैं ढूँढने लगता हूँ जवाब
पर जवाब ...
जवाब अभी तक मिला नहीं
तस्वीर अभी तक उतरी नहीं
मेरे मन में
और वह खाली पड़ा कैनवास
आज भी देख रहा है मुझे
अपनी सूनी आँखों में खामोशी लिए  !!


 लेखक परिचय - शिवनाथ कुमार 


Friday, October 3, 2014

विजय दशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ :(


कविताबाज़ी ब्लॉग की ओर से आप सभी ब्लोगर मित्रों को विजय दशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ .....!!

 -- संजय भास्कर


Wednesday, May 28, 2014

तिरंगे में उसकी मिटटी घर जो आयी थी

तिरंगे में उसकी मिटटी घर जो आयी थी 
माँ रोई और बहना रोई, रोई खुदाई थी 
तिरंगे में उसकी मिटटी घर जो आयी थी  

माँ बोली मेरा एक लाल था जिसने प्राण गवाएं 
इश्वर ने क्यों मुझको ना सौ सौ लाल जनाए 
देश सुरक्षा के खातिर सबको सरहद भिजवाती 
सौ शहीदों वालों माँ मै बड़े गर्व से कहाती 
फफक- फफक कर रोई माँ, रो रो बौराई थी 

तिरंगे में उसकी मिटटी घर जो आयी थी 
माँ रोई और बहना रोई, रोई खुदाई थी 
तिरंगे में उसकी मिटटी घर जो आयी थी  


बहना बोली भाई ने मेरे मेरा मान बढाया 
रक्षा बंधन के सूत्र वाक्य को जीवन में अपनाया 
मेरा भाई वीर था उसने वीरगति को पाया 
देश सुरक्षा के खातिर- 
हाँ देश सुरक्षा के खातिर अपनी जान गंवाई 
ये कहते ही उसने भी सुध-बुध गंवाई थी 



तिरंगे में उसकी मिटटी घर जो आयी थी 
माँ रोई और बहना रोई, रोई खुदाई थी 
तिरंगे में उसकी मिटटी घर जो आयी थी  

शहीद हो गया लाल ये मेरे बुढ़ापे का सहारा 
कर रहा गर्व मेरे लाल पे पूरा देश हमारा 
सेना में भर्ती होने का सपना मैंने दिखलाया 
देश सुरक्षा सर्वोपरि है पाठ ये मैंने पढ़ाया 
हम सबकी रक्षा के खातिर सबकुछ उसने लुटाया 
इतना कहते ही उसकी फिर आँखें भर आयीं थीं 

तिरंगे में उसकी मिटटी घर जो आयी थी 
माँ रोई और बहना रोई, रोई खुदाई थी 
तिरंगे में उसकी मिटटी घर जो आयी थी



Thursday, April 17, 2014

........... ना खुदाने सताया -- क्षमा जी :)


ना खुदाने सताया
ना मौतने रुलाया
रुलाया तो ज़िन्दगीने
मारा भी उसीने
ना शिकवा खुदासे
ना गिला मौतसे
थोडासा रहम  माँगा
तो वो जिन्दगीसे
वही ज़िद करती है,
जीनेपे अमादाभी
वही करती है...
मौत तो राहत है,
वो पलके चूमके
गहरी  नींद सुलाती है
ये तो ज़िंदगी है,
जो नींदे चुराती है
पर शिकायतसे भी
डरती हूँ उसकी,
गर कहीँ सुनले,
पलटके एक ऐसा
तमाचा जड़ दे
ना जीनेके काबिल रखे
ना मरनेकी इजाज़त दे......!!


लेखक -- क्षमा जी


Wednesday, February 26, 2014

महा शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें।


कविताबाजी ब्लॉग की और शिवरात्रि के पावन अवसर पर सभी को हार्दिक शुभकामनायें

-- संजय भास्कर 


Tuesday, February 18, 2014

.......आरक्षण मदभेद है -- समीर महाजन

आरक्षण मदभेद है ,
और भारत माँ को भी खेद है  ,
बट गए हम अपनो मे,
और जातियो  से प्रतिछेद है ,
वाह रे वाह सरकार इस देश की,
तु इंसान के वेश मे प्रेत है ,
कभी ये देश सोने की चिड़िया  था
अब तो बस
रेत है ,
और भारत माँ को भी  खेद है,
आतंक मचाया सरकार ने खुद और रुपये से भी  उसकी कुर्सी-मेज है ,
रोको दुनिया वालो और फैलादो  संदेश मेरा ,
नहीं तो आगे हमारी जिंदगी निषेद है ,
और भारत माँ को भी  खेद है !!!

"मित्रो इस संदेश को दूर-दूर तक फैलाये "

लेखक - समीर महाजन 



Thursday, October 10, 2013

मनी' इतने सरल इतनी सज्जनता शायद हि अब मिल पाए

....................प्रिय सचिन तेंदुलकर को समर्पित
देखते ही देखते ये सफ़र पूरा हो गया
खेल खेल ही रहा Sachin Tendulkar भगवान् हो गया

वाह ऐसा खेल खेला हम सब ना भूल पाएंगे 
तुम से ही होगा शुरू तुम पे ख़त्म पायेंगे

स्टीवा हो या ओलंगा या हो अख्तर
अब सब के सब चैन से सो पायेंगे

खेल तुमने जो भी खेला मुझको सब अच्छा लगा
फैन है जितने तुम्हारे शायद किसी के बन न पायंगे

मनी' इतने सरल इतनी सज्जनता शायद हि अब मिल पाए

गायत्री रेड्डी द्वारा बनाया गया
Photo: ....................प्रिय सचिन तेंदुलकर को समर्पित 

देखते ही देखते ये सफ़र पूरा हो गया 
खेल खेल ही रहा Sachin Tendulkar भगवान् हो गया 

वाह ऐसा खेल खेला हम सब ना भूल पाएंगे 
तुम से ही होगा शुरू तुम पे ख़त्म पायेंगे 

स्टीवा हो या ओलंगा या हो अख्तर 
अब सब के सब चैन से सो पायेंगे 

खेल तुमने जो भी खेला मुझको सब अच्छा लगा 
फैन है जितने तुम्हारे शायद किसी के बन न पायंगे

मनी' इतने सरल इतनी सज्जनता शायद हि अब मिल पाए

गायत्री रेड्डी द्वारा बनाया गया  स्केच

Tuesday, September 17, 2013

अगड़म- बगड़म AGDAM- BAGDAM : कुछ तो छोड़ो नेता जी..

अगड़म- बगड़म AGDAM- BAGDAM : कुछ तो छोड़ो नेता जी..: कुछ तो छोड़ो  नेता जी  मुंह तो मोड़ो नेता जी  दाल गटक गए, भात गटक गए  लोगों की औकाद गटक गए  कोयला, चारा, तेल गटक गए  स्टाम्प ...

Monday, September 16, 2013

......... कील :))

कारीगर ने
कील का सही उपयोग किया
लकड़ी के टुकड़ों को जोड़ कर
एक टेबल बना दिया //

कील ने भी
नहीं बिगड़ने दी उसका स्वरुप
दर्द सहकर भी //

दूसरी तरफ
एक नासमझ ने
कील को फेक दिया सड़कों पर
इस बार कील ने
स्वम दर्द नहीं सहा
बल्कि ...
कितनो को घायल कर गया //


21वी सदी का इन्द्रधनुष ब्लॉग से बबन पांडये जी की एक बेहतरीन रचना आज सभी के साथ साँझा कर रहा हूँ.....उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी  !

@ संजय भास्कर 

Wednesday, August 28, 2013




कृष्ण तुम मेरे सारथी हो 

तुम रहते हो मेरी वार्डरोब में
काले रंग की उन साड़ियों में

जिन्हें खरीदा है मैंने
दिल्ली, मद्रास, हैदराबाद के बाज़ारों से
जब-तब लिपट जाते हो मेरे तन से
कृष्ण तुम मेरा आवरण हो

तुम बहते हो मेरे घर के नलकों में
जिनसे आता है यमुना का पानी
रोज़ कतरा कतरा पीती हूँ तुमको
कृष्ण तुम मेरा जीवन हो

तुम्हे बजते हो मेरे कानो में
जब जब सुनती हूँ एफ एम
कई गीतों ऐसे भी होते हैं
जिनमे एक सुर बासुरी का होता है
कृष्ण तुम मेरा मनोरंजन हो

कृष्ण तुम मेरी नोटबुक हो
तुम्हारे सिधान्तो के सहारे
मोटीवेशनल गुरु समझाते हैं अपनी बात
वो मानते हैं कि
तुम्हारी नीतियों के आगे शून्य है
कॉरपोरेट की पूरी दुनिया
तुमने कुरुक्षेत्र में जो कहा था
वो केवल अर्जुन के लिए नहीं था
इसीलिए तो आईआईएम और आइआइटी ने
किताबों में सहेज लिए हैं तुम्हारे मंत्र
कृष्ण तुम मेरा सेलेबस हो

कृष्ण तुम ट्राफिक की लाल हरी बत्ती हो
जीवन की आपाधापी में
जब विचारों का ट्राफिक जाम हो जाता है
जब मुश्किल हो जाती है अपनी राह पहचानना
तब याद आती है गीता
तब खुले हैं ज्ञान के द्वार
तब दिखता है रास्ता
कृष्ण तुम मेरे सारथी हो
================== अरशाना अज़मत 

Sunday, August 25, 2013



ये मेरी नाराजगी है भारतीय अर्थवय्वस्था व सैन्य वयवस्था को लेकर व तमाम देश के व समाज के ठेकेदारों के प्रति .

मनी'थक गया है झुक गया है कोई लूट रहा है
किसी ने सच कहा है हिंदुस्तान अब टूट रहा है

वतन पे मिटने वालो का जो वतन पे पहरा है
मनी'देख रहा हु साथ उनका भी अब छूट रहा है

गाली है तू कैसे कहू तुझको मै नेता वतन का
मनी'लूट कर मेरा वतन तू कहा अब फूट रहा है
=================मनीष शुक्ल

Wednesday, August 21, 2013

मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ

खुद से जीतने की जिद है, मुझे खुद को ही हराना है 
मै भीड़ नहीं हूँ दुनिया की, मेरे अन्दर एक ज़माना है 

मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 
डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
अजीब हाल है इस दुनियादारी का 
ये सारे हाल तेरे हाल पर ही छोड़ता हूँ 

डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 
डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 

टूटने दो टूटने के बाद ही तो कुछ बनेगा 
छूटने दो छूटने के बाद ही तो वो मिलेगा 
एक परिंदा है अभी जिंदा मुझमें कहीं थोडा बहुत 
उड़ने दो उड़ने के बाद ही तो वो कहेगा 

मै मलंग, बनके पतंग 
अपने फलक को चूमता हूँ 

डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 
डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 

अजीब हाल है इस दुनियादारी का 
ये सारे हाल तेरे हाल पर ही छोड़ता हूँ 


चाहता हूँ  मै भी उड़ना और तैरना 
चाहता हूँ  मै भी नाचूँ बनके झरना 
तोड़ दूं जंजीर जिनसे मै बंधा हूँ 
चाहता हूँ लिख दूं हवा पे नाम अपना 

चाहता हूँ इस कदर,
इसी चाह में मै झूमता हूँ 

डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 
डूबता हूँ, डूबता हूँ, डूबता हूँ 
मै खुद में खुदा को ढूंढता हूँ 

अजीब हाल है इस दुनियादारी का 
ये सारे हाल तेरे हाल पर ही छोड़ता हूँ 

Friday, August 9, 2013

"शब्द सवेरे के, अब तक ताज़े हैं "

साँझ के 
झुटपुटे की पंक्तियों में, 
शब्द सवेरे के,

अब तक ताज़े हैं 
चलो, गुलदस्ता बना लेते हैं एक और,
जिंदगी के लिए; 

किसी 
झिडकन के साथ, 
बरसी है
बारिश ये अभी,
कुछ बूंदे हथेली पर, 
कुछ माथे पर हैं, 
अथक श्रम कर रही है जिंदगी ये 
जिंदगी के लिए; 

जो है 
लुटाने को उसे है  तत्पर,
ये मुट्ठी खुल रही है 
पालने  से पैरों  तक का 
सफ़र तय किया है,
अब कितनी अकलमंदी से 
गवां रहे हैं जिंदगी को, 
जिंदगी के लिए

थोड़ी इसे भी राहतें  बख्शें, 
थोड़ी सी धडकनें 
इसकी भी रह सकें साबुत,, 
सिफ़र  कर दें कभी तो चाहतों को 
शेष रख लें कभी तो थोडा समय 
बेनज़र  सी गुजर जाती हुई इस 
जिंदगी के  लिए;

एक चिड़िया 
सुबह जो चहकी थी, 
अभी भी शाख पर दिल की,
वक़्त की दालान में बैठी है 
एक हाथ का ही फासला ये 
चाहें तो फिर से एक बार 
थोड़ी सी गुनगुनाहट लें सहेज,
थोड़ी से चहचहाहट  
जिंदगी के लिए.   

Wednesday, July 31, 2013

रीढ़ की हड्डी नहीं गिरवी रखी, इसलिए ये सर तना है दोस्तों




गाँव से शहर आकर सादादिल लोगों को अक्सर शहर बड़ा लुभावना और शहरी तेजतर्रार लगते हैं... फिर याद आता है कि अब गाँव में भी गाँव कहाँ रहा है...गंवई राजनीति खून-खराबे, चौपालों के छल और भेदभाव सब भुलाकर... वो जीना चाहता है...शहर को जीतना चाहता है...आगे बढ़ना चाहता है....लेकिन कैसी जीत??? जो अपना ईमान दांव पर लगाकर मिले वो जीत भी भला जीत है???... श्री सी एम त्रिपाठी जी की इन चंद पंक्तियों में गाँव से आकर शहर में बसे किसी ऐसे ही आदमी की पूरी की पूरी ज़िन्दगी हैं.. पत्रकारिता के शुरूआती दिनों में मुझे कुछ माह उनसे सीखने का मौका मिला...खुशनसीबी है मेरी कि मैं उन्हें बापू जी कह पाती हूँ...

गाँव भीतर से घुना है दोस्तो

शहर लोहे का चना है दोस्तों 

उस महल के द्वार पर दस्तक न दो
वो सियासत से बना है दोस्तों

जो हमारा ही लहू पीता रहा
वो हमारा सरगना है दोस्तों

रीढ़ की हड्डी नहीं गिरवी रखी
इसलिए ये सर तना है दोस्तों

सी एम त्रिपाठी

Monday, July 29, 2013

अब वक्त की ठोकर पे खड़ा सोच रहा हूं



संक्षिप्त परिचय: मीडिया में करीब 18 साल से अपनी सेवाएं दे रहे श्री सी एम् त्रिपाठी मीडिया के ग्लैमर से कई मील दूर हैं... इनकी रचनायें तमाम मंचीय कवियों और रचनाकारों को ठेंगा दिखाती हैं... शब्दों और भाषा की मजबूत पकड़ रखने वाले श्री त्रिपाठी स्वतंत्र भारत में फीचर डेस्क प्रभारी के पद पर हैं... मीडिया में शराफत को सहेजकर चल रहे त्रिपाठी जी की खाली जेबें सिर्फ और सिर्फ सम्मान से भरी हैं... पैसे की कमी के कारन उनका अभी तक कोई रचना संग्रह नहीं आ सका है... कविताबाज़ी में हम लगातार उनकी कवितायेँ प्रकाशित करेंगे...ताकि आपतक ऐसे मसिजीवी भी पहुँच सकें जो धन की दीवार के पीछे छिप गए हैं....





सीने में ऐतबार के खंजर उतर गए
बरता जो ऐहतियात तो साये से डर गए

अब वक्त की ठोकर पे खड़ा सोच रहा हूं
दुःख दर्द मेरा बांटने वाले किधर गए

शायद कि मिल ही जाये सुकूं दोस्तों के बीच
पूछो न इस तलाश में किस किस के घर गए

गिरना ही था तो एक नहीं सौ मुकाम थे
ये क्या किया कि आप निगाहों से गिर गए

चंद्रमणि त्रिपाठी (सी एम त्रिपाठी)